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दुनिया मेरे आगे: सभ्य समाज में जीवों के प्रति असंवेदनशीलता घातक

‘पशु क्रूरता निवारण अधिनियम’ भारत में पशुओं के खिलाफ क्रूरता को रोकने के लिए 1960 में लाया गया था।
Written by: अनुपमा तिवाड़ी | Edited By: Bishwa Nath Jha
नई दिल्ली | Updated: January 31, 2024 10:21 IST
दुनिया मेरे आगे  सभ्य समाज में जीवों के प्रति असंवेदनशीलता घातक
प्रतीकात्‍मक तस्‍वीर। फोटो- (इंडियन एक्‍सप्रेस)।
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कुछ समय पहले पास के इलाके मेें एक तेज रफ्तार वाहन ने सड़क से गुजरते सांड़ को टक्कर मार दी। बुरी तरह घायल सांड़ का सींग एक तरफ लटक गया था और वह किसी तरह वहां से भाग जाने की कोशिश कर रहा था। कोई भी यह दृश्य देखता तो उसे दुख होता और टक्कर मारने वाली कार के चालक पर गुस्सा आता। किसी को भी यह समझना जरूरी नहीं लगता कि ये भी मनुष्यों की तरह ही एक जीव हैं और इन्हें भी जीने का हक है।

उस दिन कड़कड़ाती ठंड जरूर थी, मगर दृश्यता इतनी भी कम नहीं थी कि तीस-चालीस फुट की दूरी पर इतना बड़ा जानवर दिखाई न दे। सड़क मार्ग से यात्रा करते हुए खासतौर पर उच्च मार्गों पर हर कुछ दूरी पर कुत्ते या अन्य कोई छोटा पशु गाड़ियों से टकराकर मरे दिखाई दे जाते हैं। इनमें कुछ पालतू भी होते हैं, मगर ज्यादातर ऐसे लावारिस जानवर होते हैं, जिन पर कोई मालिकाना हक नहीं जताता।

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ये जानवर क्यों आ जाते हैं सड़कों पर? यह देखने की बात है। कुत्ता तो बस्तियों के बीच रहने वाला जानवर है, लेकिन कई ऐसे जानवर हैं जो इसी तरह की दुर्घटनाओं में दम तोड़ते हैं। यह जगजाहिर है कि हमने उनकी कुदरती जगहों यानी जंगलों को हथिया लिया है, उन्हें नष्ट करते जा रहे हैं। शहर फैलते और जंगल सिकुड़ते जा रहे हैं। ऐसे में ये जीव कहां जाएं? गली-मुहल्लों में घूमते कुत्ते तो कई बार लोगों को आंखों देखे नहीं सुहाते।

ऐसे सात-आठ कुत्तों को देखा जाए तो उनमें से एक या दो की आगे या पीछे की एक टांग टूटी मिलेगी, जो पत्थर या किसी भारी वस्तु से मार कर तोड़ी गई होती है। एक घोड़े के एक आगे और एक पीछे का पैर एक साथ इतनी छोटी रस्सी से बांध दिया गया था कि उसे तेज चलने में भी परेशानी हो रही थी। कई बार खुला घूमते सांड़ों को पकड़ कर उसकी आंख पर पट्टी बांध देते हैं। ऐसे में वह और भी जोखिम में आ जाता है।

एक परिचित ने अंधविश्वास की वजह से तोते के दो बच्चों के पंख काटकर छोटे बच्चों को एक पिंजरे में रख लिया। वजह यह थी कि उन्हें किसी ने कह दिया था कि अगर किसी आदमी को वश में करना है तो पहले किसी पक्षी को वश में करो। होली के दिनों में गधों पर रंग डालकर उस पर लोगों को बहुरूपिया बनकर उसे परेशान करते देखा जा सकता है।

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ये सब ऐसे जानवर थे जो कि पता नहीं किसी के पालतू थे या नहीं, लेकिन आमतौर पर लावारिस ही लग रहे थे। जाहिर है, ये लावारिस थे तो किसी पर भार भी नहीं थे। लेकिन इस तरह उन्हें संकट में डालना या उनके साथ क्रूरता करना कितना अमानवीय है? कितने ही जीव अपने झुंडों में रहना पसंद करते हैं, लेकिन हम उनकी मूल प्रवृत्ति के विपरीत स्थितियां बनाकर उन्हें उनके परिवार या समुदाय या झुंड से अलग कर देते हैं।

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क्या हम सोच सकते हैं कि इन जानवरों के भी पूर्वज रहे होंगे, जिन्हें हमारे पूर्वजों ने जीने दिया, इसलिए ये हैं और इन सभी के रहने से हमारा अस्तित्व है। इसे वही समझ सकते हैं, जो पारिस्थितिकी-तंत्र के चक्र को ठीक से समझते हैं। पशु-पक्षियों से प्रेम करने वाले उनकी उदासी और खुशी तक जान लेते हैं।

‘पशु क्रूरता निवारण अधिनियम’ भारत में पशुओं के खिलाफ क्रूरता को रोकने के लिए 1960 में लाया गया था। साथ ही इस कानून की धारा-4 के तहत 1962 में ‘भारतीय पशु कल्याण बोर्ड’ का गठन किया गया। यह अधिनियम किसी जानवर को पीटना, लात मारना, यातना देना, अंग-भंग करना, कोई हानिकारक पदार्थ देना या क्रूरता से मारना अपराध बनाता है।

इस अधिनियम का उद्देश्य पशुओं को अनावश्यक सजा या जानवरों के उत्पीड़न की प्रवृत्ति को रोकना है। लेकिन प्रशासन की व्यस्तता या अनदेखी के चलते कितने ही पशु-पक्षी हमारी क्रूरता के बेवजह शिकार बनते हैं। एक सभ्य समाज में आज भी जीवों के प्रति असंवेदनशीलता दिखाई देती है, जिसका खमियाजा इन जीवों को बेवजह उठाना पड़ता है।

किसी ने कहा है कि किसी देश या समाज को समझना हो तो उसके सबसे वंचित वर्गों के जीवन को देखो। बहुत सारे पशु-पक्षी हमारे जीवन और समाज के हिस्से रहे हैं। जीवों के प्रति व्यवहार हमारी परवरिश की एक बानगी होता है कि हम उनके साथ कैसा व्यवहार करते हैं। नगरीय विकास के चलते आज फुटपाथ पक्के हैं, नालियां पाट दी गई हैं। पानी की खेलियां, जो गांवों में पशुओं के पानी पीने के लिए होती थीं, अब अस्वच्छता की चिंताओं के चलते कहीं नहीं मिलतीं।

अब तो ये जानवर भरी गर्मियों में छाया के लिए भी भटकते दिखाई देते हैं। प्रशासन द्वारा किए प्रयास पर्याप्त नहीं होते हैं। इनके लिए पशु-पक्षी संरक्षण संस्थानों का सहयोग लिया जा सकता है। सामूहिक प्रयासों से हम इन लावारिस जीवों को क्रूरता से बचाने जैसे प्रयास तो कर ही सकते हैं। एक सभ्य समाज को इनके प्रति संवेदनशील होना चाहिए। उनके साथ हमारे द्वारा बेवजह क्रूरता तो न होने पाए।

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