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दुनिया मेरे आगे: इच्छाओं के अनंत आकाश का कोई ओर-छोर नहीं

मन को नियंत्रित करने के लिए हमें बाहर से कोई निर्देश नहीं मिलता है, बल्कि अपने आप को स्वयं निर्देशित करना पड़ता है।
Written by: जनसत्ता | Edited By: Bishwa Nath Jha
नई दिल्ली | January 03, 2024 11:08 IST
दुनिया मेरे आगे  इच्छाओं के अनंत आकाश का कोई ओर छोर नहीं
प्रतीकात्‍मक तस्‍वीर। फोटो- (इंडियन एक्‍सप्रेस)।
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रेखा शाह आरबी

हमारे शरीर के बाहरी हिस्से पर अगर कोई गंदगी रहती है तो उसे साफ करना आसान है। उसके लिए अनेक साधन इस दुनिया में उपलब्ध हैं। लेकिन जब हमारे मन के भीतर गंदगी रहती है, तो उसे साफ करना काफी कठिन है, क्योंकि अक्सर हमें हमारी कमियां और गलतियां दिखाई नहीं देती हैं। अगर कुछ ऐसा महसूस भी होता है तो हमारा मन ही मानने को तैयार नहीं होता कि हम गलत हैं, हमारे अंदर कोई दुष्प्रवृत्ति भी है, हम गलत हैं और गलत कर रहे हैं। जबकि उसी के द्वारा ईर्ष्या, क्लेश, क्रोध, निराशा की उपज होती है। उसी के द्वारा तनाव और चिंता होती है। हम किसी के प्रति ईर्ष्या महसूस करते हैं, यह हमारे मन की ही ईर्ष्यालु प्रवृत्ति यानी गंदगी है।

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कहना और सुनना बहुत आसान है कि अपने मन की गंदगी साफ कीजिए, लेकिन असल जिंदगी में इसे करना उतना ही कठिन है, क्योंकि बहुत सारे लोगों को तो यह भी नहीं पता होगा कि आखिर आंतरिक ईर्ष्या और कलुष को साफ करने का तरीका क्या है। ऐसा भी नहीं है कि हम इसे एक बार साफ कर दें तो यह गंदगी हमेशा के लिए खत्म हो जाती है। यह बार-बार खरपतवार के जैसे अभाव की जमीन पर गाहे-बगाहे उग ही आती है और हमें ईर्ष्यालु बनने की तरफ धकेलती है, हमें गलत रास्ते पर आगे बढ़ा देती है।

असल जिंदगी में ईर्ष्या को दूर करने के लिए बहुत ही चिंतन मनन और जतन करना पड़ता है। अपने मन और मस्तिष्क को साधकर नियंत्रण करना पड़ता है। आंतरिक अनुशासन करना पड़ता है। आंतरिक अनुशासन से यहां तात्पर्य है धैर्य, संयम, धर्म, करुणा, त्याग, दया के अनुसार जीवन। तभी जो हमें मिला है, हम उसी में आनंदित रह सकते हैं। वरना मन तो बेलगाम घोड़ा है जो आकांक्षाओं के जंगल में सरपट दौड़ता रहता है। और वह ग्राह्य-अग्राह्य, सभी चीजें जो उसके मन को भली लगती हैं, उसकी आकांक्षा करता ही रहता है।

मन को नियंत्रित करने के लिए हमें बाहर से कोई निर्देश नहीं मिलता है, बल्कि अपने आप को स्वयं निर्देशित करना पड़ता है। यह सब स्वयं द्वारा की जाने वाली क्रिया है, क्योंकि अन्य कोई व्यक्ति नहीं जान रहा है कि हमारे मन में क्या चल रहा है और हम किस चीज की इच्छा कर रहे हैं और वह किस हद तक सही और गलत है। दुनिया को पता तब चलता है, जब वह काम हम कर चुके रहते हैं। दुनिया जो देखती है उसके अनुसार हमें और हमारे व्यक्तित्व को परिभाषित करती हैं।

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ईर्ष्या दरअसल वे कामनाएं होती हैं, जिन्हें हम बहुत समय से पूरा तो करना चाहते हैं, पर अभाव के कारण उन्हें पूरा करने का हमारे पास कोई जरिया नहीं होता है। वास्तव में ईर्ष्या हमारी अपूर्ण कामनाओं का बजबजाता हुआ ढेर है। ईर्ष्या से बचने का यह भी उपाय है कि हमें जो कुछ प्रकृति ने प्रदान किया है, उसके लिए उसके प्रति आभारी रहें।

ऐसी अपनी मन:स्थिति बनाएं। जब हम किसी के प्रति आभारी और आशावादी रहते हैं तो हमारे विचार सकारात्मक हो जाते हैं। और जब जीवन में हम सकारात्मक होने लगते हैं, तब हमारे अंदर से अनेक दुष्प्रवृतियां अपने आप दम तोड़ने लगती हैं। तब ईर्ष्या करने के बजाय हम कुछ और रचनात्मक चीज करने लगते हैं। हम अपनी ऊर्जा को सही दिशा में लगाना शुरू कर देते हैं और प्रगति पथ पर बढ़ने लगते हैं। उस समय हमारी मनोदशा दूसरों को नीचा दिखाने के बजाय खुद को आगे बढ़ाने की होने लगती है।

जब हम किसी की सफलता से ईर्ष्या करने के बजाय प्रेरणा लेने लगते हैं, तभी हमारे जीवन में सकारात्मक बदलाव होने लगते हैं जो बेहद अच्छा है। इस संबंध में ओशो का कहना है कि ईर्ष्या से बचने का एक ही उपाय है। मानसिक अनुशासन यानी मन को अनुशासन में रखने की कला सीखी जाए। मन की लगाम को कसकर पकड़े रहा जाए… जिस व्यक्ति का स्वभाव ईर्ष्या करने का है, उसे अन्य बातों के बारे में सोचने की आदत छोड़ देनी चाहिए। उसे यह पता लगाना चाहिए कि उसके पास ऐसा क्या नहीं है, जिसके कारण वह ईर्ष्यालु बन गया है… और उसकी पूर्ति का उसे उपाय करना चाहिए।

यह विचार इस अवधारणा पर है कि शायद हमारी इच्छापूर्ति होने पर हम ईर्ष्या करना छोड़ दें, लेकिन इसकी गारंटी कौन लेगा कि एक इच्छापूर्ति होने के उपरांत हम दूसरी इच्छाएं नहीं करेंगे। हम संतोषी प्रवृत्ति के हो जाएंगे। सबसे अच्छा यही है कि जो हमारे पास है, उसी में संतुष्टि का अनुभव करें। उसी को अपनी प्रसन्नता का साधन बनाएं।

इच्छाओं के अनंत आकाश का कोई ओर-छोर नहीं है। इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि हम नवीन इच्छाएं न करें। नवीन इच्छाएं तो करें, पर ईर्ष्यारहित होकर। उसकी प्राप्ति के साधन शुचितापूर्ण हों, न कि ईर्ष्यापूर्ण। अगर हम किसी चीज की इच्छा करते हैं तो उसकी प्राप्ति के लिए प्रयत्न करते हैं। सबसे अच्छा है कि इच्छा और जरूरतों के बीच एक संतुलन साधकर जीवन जिया जाए।

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