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दुनिया मेरे आगे: वैचारिक विपन्नता गरीबी से भी जयादा कष्टकारी

कुंद मन और सोच वाले परिवार में ऐसी चीज जन्म लेती है जो सामान्य तौर पर मुखर तो दिखती है, मगर जल्दी ही वह नष्ट भी हो जाती है।
Written by: जनसत्ता | Edited By: Bishwa Nath Jha
नई दिल्ली | April 16, 2024 09:42 IST
दुनिया मेरे आगे  वैचारिक विपन्नता गरीबी से भी जयादा कष्टकारी
प्रतीकात्मक तस्वीर। फोटो -सोशल मीडिया)।
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कल्पना मनोरमा

विचार एक प्रकार की ऊर्जा है। जिस तरह से मस्तिष्क मनुष्य के शारीरिक और मानसिक कार्यों को नियंत्रित करता है, उसी तरह विचारों द्वारा वह अपने जीवन को परिभाषित कर सकता है। मनुष्य के विचार परिपक्व और अच्छे होने चाहिए। उसका सोचना, महसूस करना और चाहना तर्कसंगत और कल्याणकारी होना चाहिए।

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किसी भी मनुष्य के विचारों में जितनी ताकत होगी, उतनी ही वह अपने और अपनों के जीवन को सगुण रूप से फलित होते देख सकेगा। इस तरह की बातें खूब सुनने में आती रहती हैं। विचार शक्तिमान है। दुनिया भर में जितने भी आविष्कार हुए हैं, वे वैचारिक संपन्नता के आलोक में ही संपन्न हो सके और हो रहे हैं। विचार शून्यता अभिशाप है। वैचारिक विपन्नता गरीबी से भी जयादा कष्टकारी है।

यह मान सकते हैं कि मनुष्य को वैचारिक रूप से मजबूत होना चाहिए। पर ऐसा संभव हो कैसे? कैसे प्रत्येक मनुष्य तर्कशील और विचारशील हो सके? जबकि वैचारिक तौर पर कुंद लोगों की कमी नहीं दुनिया में। कुंद मन और सोच वाले परिवार में ऐसी चीज जन्म लेती है जो सामान्य तौर पर मुखर तो दिखती है, मगर जल्दी ही वह नष्ट भी हो जाती है। अगर किसी बच्चे पर यह संस्कार हावी है तो वह कैसे विचारशील बन सके? कैसे वह वैचारिक असहिष्णुता से बच सके? इस पर विचार करना होगा, क्योंकि रंग-रूप की कुरूपता तो एक सामाजिक अवधारणा और आग्रहों से जुड़ा प्रश्न है, मगर वैचारिक असहिष्णुता बेहद दुखदायी है।

जब यह कहा जाता है कि मद्धिम सोच वाले बच्चे की कोई गलती नहीं है और उसे तो पारिवारिक धरातल ही कुंद मिला, इसलिए उसकी सोचने की क्षमता भी संकुचित हो गई, तब लोग आक्रामकता के साथ कहते मिलते हैं कि बच्चे के ऊपर परिवार का महत्त्व तभी तक रहता है, जब तक बच्चा घर से बाहर नहीं निकलता।

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जिस दिन बच्चे ने घर की दहलीज लांघी, समाज में घुलने-मिलने लगा तो वैचारिक संपन्नता और विपन्नता दोनों प्रकार के कारक वह समाज से ही ग्रहण करता है। ऐसा बोलकर छुट्टी पाने वाले अभिभावकों से बस इतना ही कहा जा सकता है कि उन्होंने शैशवकाल से लेकर बाल्यकाल तक अपने बच्चे के सीखने या ग्रहण करने वाले स्थान पर कैसा चुंबक चिपका दिया है! जैसा चुंबक उन्होंने बनाया होगा, उसी के अनुसार वह लोगों और विचारों की ओर आकर्षित होता चला जाएगा।

लोग यह भी कहते हैं कि ‘संगत ही गुण ऊपजे, संगत ही गुण जाएं’। यह बिल्कुल सही कहावत है और अक्सर अपने आसपास इसके अर्थ को महसूस किया जा सकता है। मगर संगत का चुनाव भी बच्चा अपनी प्राथमिक सोच और महसूस करने वाली विधि के मद्देनजर ही चुनेगा। यों कहें कि चुनता भी है।

व्यक्ति चाहे कितना भी बड़ा और संपन्न या छोटा और विपन्न जीवन जी चुका हो, उसकी छवियों और हाव-भाव की गहराइयों में उसके मां-बाप की छाप दूर से दिखाई पड़ती है। उसी तरह, जिस तरह एक पेड़ की उपलब्धि और योग्यता उसकी उस भूमि पर निर्भर होती है, जिस पर वह उगाया गया होता है। धान की फसल अच्छी चाहने वाले किसान धान की पौध को तैयार करने के समय बेहद सजग और चैतन्य रहते हैं।

यह भी ध्यान रखने की बात है कि विचार करने की क्षमता शारीरिक क्षमता के साथ बढ़ती है। इस बात को ध्यान में रखते हुए ही परिवार के सभी लोगों को अपने शिशु से जुड़ी बातों में, मसलन, खाना, पीना, कपड़े, रंग आदि के जुड़े किसी भी मुद्दे को उसके समाने रखकर बार-बार अपने बच्चे से पूछना और कहना चाहिए कि जो बात हम कह रहे हैं, तुम इसके बारे में क्या सोचते हो? तुम विचार करो। समय लेकर सोचो और उसके बाद हमें बताओ। तुम्हारी राय महत्त्वपूर्ण है हमारे लिए।

हर किसी को खुले मन के स्वस्थ संवाद और अपनी भूमिका अहम होने की चाह होती है। बचपन में कोई भी बच्चा किसी की भी बात को हल्के में या सतही तौर पर नहीं लेता है, क्योंकि आरंभिक समय में संसार की हर वस्तु और विचार उसके लिए अहम होते हैं। सीखने और करने की लालसा उसमें प्रबल होती है। वह हमारे कहे के अनुसार जरूर अपने को अहमियत देना, सोचना, सुनना और सीखना शुरू कर देगा।

मगर यहां भी माता-पिता को चौकस रहने की जरूरत होगी। उम्र के तकाजे के मुताबिक उसकी राय अपरिपक्व और अपनी तरह की होगी। हमें ‘उसकी तरह’ को ही सुधारना है। सही को सही और गलत को गलत कहना है। स्वीकार और अस्वीकार, दोनों भाव व्यक्ति को बचपन से ही समझ में आ जाने चाहिए।

हमारे द्वारा निर्देशित प्रश्नों के मद्देनजर बच्चे अपने विचार और निर्णय के साथ जब हमारे समाने आएं तो यह बिल्कुल जरूरी नहीं होगा कि किसी मामले में वह सौ फीसद सही हो, लेकिन जब वह अपनी क्रियाशीलता के साथ हमारे सामने आएगा, तब उसकी सुनने, देखने और ग्रहण करने की क्षमता उर्वर होगी। वह हमारी बातों में रुचि ले रहा होगा।

उसी समय हम अपने मंतव्यों और प्रश्नों को दोहराते हुए उसके द्वारा सोचे या विचार किए गए उत्तरों में सुधार कर सकते हैं। बच्चा बड़ी सहजता से अपने सोचे हुए विचारों में सुधार करने को तैयार हो जाएगा, क्योंकि उस समय हमारी बात उसे अपने ऊपर थोपी हुई न लग कर अपने होने का अहसास नजर आएगा उसमें। बच्चा एक अलग इंसान है। माता-पिता उसे आपकी जायदाद न समझें। इस बारे में अभिभावकों को एक बार सोचना चाहिए।

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