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दुनिया मेरे आगे: इंसानियत की संवेदना और कुदरत का हिसाब, दूसरों का साथ होने से ही मिलती है खुशियां

जीवन की पहली पाठशाला परिवार और समाज होते हैं। हम सभी मानव जीवन के उस बिंदु तक पहुंच जाएं, जब हम भौतिकवाद या मशीनीकरण के संकुचित जीवन के नहीं, केवल प्रकृतिवाद के पुजारी बने। वहीं से एक सुखी और संतोषी इंसान की दमक और चमक सबको प्रोत्साहित करती है। पढ़ें पावनी के लेख।
Written by: जनसत्ता
नई दिल्ली | Updated: March 01, 2024 10:07 IST
दुनिया मेरे आगे  इंसानियत की संवेदना और कुदरत का हिसाब  दूसरों का साथ होने से ही मिलती है खुशियां
कुदरत पल-पल हमको यही सलाह देती है कि हर इंसान अपनी संवेदनशीलता को बचाए रखे।
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एक उपवन में अच्छी तरह घूम-घूम कर देखा जाए तब महसूस होगा कि उसकी समस्त हरियाली एकदम अलग-अलग होकर भी इक दूजे के लिए कितनी सहयोगी है। रंग-बिरंगे फूल खिलते हैं, जिन्हें देखकर मन खुशी से झूम उठता है। अगर फूल न होते तो ये तितली-भौंरे भला किसकी चारों तरफ मंडराते! फिर आम, इमली, अमरूद, चीकू न होते तो मधुमक्खी अपना छत्ता किस पर बनाती! गिलहरी को तो पेड़-पौधे चाहिए और चींटी तक को जरूरी है दूब घास का हरा-भरा कालीन। उपवन इन सबके बीच अपनी पूर्णता को पा जाता है। तभी तो वह बगीचा बनता है! इसी तरह संसार की हर शय है। वसंत को आना है तो उसे सरसों के पीले खेत, गेहूं की बाली, चने का झाड़, बेरों की महक और आम्र मंजरी ही पूर्णता प्रदान करती है।

नाव कितनी भी बढ़िया क्यों न हो, कीमत नदी या झील में ही होती है

एक नाव कितनी भी बढ़िया क्यों न हो, कितनी ही कीमती हो, मगर नदी या झील में उतरकर ही नाव का होना माना जाता है। इन सच्चे सार्वभौमिक उदाहरणों से हमको यह साफ पता चलता है कि हम सब और हमारा यह सारा संसार एक दूजे के लिए ही है। अगर दर्शक न हों तो कलाकार अपनी कला का प्रदर्शन किसके लिए और किसके सामने करेगा? गायक को श्रोता ही पूर्ण रूप प्रदान करते हैं। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं के चुटकुले और लतीफे तो एकदम फुस्स हो जाएंगे, अगर उनको पढ़ कर कोई हंसने वाला ही न हो।

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धरती है, माटी है, किसान है, प्यासे लोग हैं, तभी रिमझिम सार्थक है

बादल के आंचल से बरस कर रिमझिम किधर जाती, अगर उसे एक नया अर्थ देने के लिए धरती नहीं होती। धरती है, माटी है, किसान है, प्यासे लोग हैं, तभी रिमझिम का होना सार्थक हुआ। यहां एक बात कहना बहुत जरूरी है कि बाजार और हमको भी एक दूसरे का पूरक बना कर, बता कर काफी ढोल-ढमाका बजाया जा रहा है। मगर बाजार के सामने हम कौन हैं, इसका उत्तर हमें खुद से ही पूछना चाहिए। बाहर जो चमचमाता हुआ ललचाता बाजार है, वह हमारी उपयोगिता और अपना मुनाफा देख कर ही उत्तर देगा। हम जो कुछ भी हैं, सबसे पहले खुद के लिए हैं। बाजार इस बात को नहीं समझता है। हमें समझना चाहिए।

एक समाज के रूप में हम सब एक अच्छे समाज के लिए हैं। क्रय और विक्रय के लिए कतई नहीं। जो इंसान जरा भी भावुक है और जरा भी आत्मीय है, वह अपने समूह और समाज की ताकत को झट से जान और पहचान लेता है। अपने परिवेश की कद्र करता है, उसकी परवाह करके अपने होने की सार्थकता सिद्ध करता जाता है। आज बाजारवाद के झूठे और आडंबरी माहौल में आम इंसान का जीवन बेवजह दिखाई देने लगा है। कारण यह है कि उसके ही सामने कुछ मुट्ठी भर लोग जुगत लगाकर सफलता की सीढ़ी चढ़ते जा रहे हैं। यानी एक काबिल आदमी अपने को स्थापित करने के लिए छटपटा रहा है। इसका कारण यही तो हुआ कि हम कहीं न कहीं अपनों की अनदेखी कर रहे हैं।

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एक लघु फिल्म का एक दृश्य इस तरह है कि एक चंचल चपल-से युवक को समझाते हुए अनुभवी बुजुर्ग कहते हैं कि बेटे, तुम जंगल में जा तो रहे हो, पर एक बात का पूरा खयाल रखना कि बेवजह ही किसी मासूम और निर्दोष पंछी या परिंदे को चोट न पहुंचा दो। वह युवक नासमझी में अनगिनत जीव और हरियाली को नुकसान पहुंचाता है। कुछ महीने बाद जब अपने कबीले में लौटता है तो वहां पर हिंसा का अजीबोगरीब साम्राज्य फैला देखकर घबरा जाता है। तब वे बुजुर्ग कहते हैं कि हम सब एक दूजे के पूरक है। तुमने जानबूझ कर जो हिंसा की, वही फैलती गई। तो अब इसका उपाय है कि पौधे लगाओ और मासूम जानवरों की संख्या बढ़ाओ। युवक ने ऐसा ही किया। इसके बाद तेज बदलाव हुआ। हिंसा धीरे-धीरे कम हुई और फिर से एक संतोष फैलने लगा, फलने-फूलने लगा।

यह प्रतीक रूप में कही गई कहानी है, मगर शायद इसीलिए कहा गया है कि अपनी कमाई बांटने वाले, अपनी रोटी सबसे साझा करने वाले को हमेशा प्रोत्साहन देना चाहिए। मगर इन दिनों ‘मैं और मेरा’, ‘बस मैं ही’, ‘मेरा जीवन ही’ चल रहा है। इस तरह की मतलबी भावना से विकसित सांसारिक विवशता में उलझे हुए लोग कभी सामाजिक या भावुक नहीं हो सकते। किसी ने क्या खूब कहा है कि मेरे पुराने बटुए में बहुत सारा समय और एक दोस्त था। मगर मेरे नए आधुनिक और महंगे थैले में केवल रुपए ही हैं। हम कब समझेंगे कि जिद और झूठे मान-अभिमान के गर्त में डूबकर हम समाज से कट रहे हैं।

इसीलिए आज अमीर मनोरोगी बढ़ते जा रहे हैं। गौर किया जा सकता है कि मनोरंजन के साधन पिछले पचास साल की तुलना में आज हजार गुना से भी अधिक है, लेकिन अवसाद और निराशा भी उसी तरह अपना सुरसा मुख फैला ही रही है। जीवन की पहली पाठशाला परिवार और समाज होते हैं। हम सभी मानव जीवन के उस बिंदु तक पहुंच जाएं, जब हम भौतिकवाद या मशीनीकरण के संकुचित जीवन के नहीं, केवल प्रकृतिवाद के पुजारी बने। वहीं से एक सुखी और संतोषी इंसान की दमक और चमक सबको प्रोत्साहित करती है।

कुदरत पल-पल हमको यही सलाह देती है कि हर इंसान अपनी संवेदनशीलता को बचाए रखे। हम एक दूसरे की यथासंभव मदद और सराहना करके एक साहसी मानव समाज बना सकते हैं। अपनी असीम ऊर्जा को अपने समाज के संग साथ खर्च करना समझदारी है। आभासी दुनिया में बेवजह डूबे रहना अपूर्ण दिमाग की निशानी। इंसानियत, सामाजिकता और खुशहाली की जुगलबंदी ही इस संसार में कमाल करती है।

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