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दुनिया मेरे आगे: होली है प्रेम और प्रकृति में लीन होने का त्योहार

होली के हुड़दंग में मन की कुंठा, ईर्ष्या बैर, भेद, ऊंच-नीच की भावना, अमीर-गरीब का अंतर सबकी होली जल जाती है।
Written by: जनसत्ता | Edited By: Bishwa Nath Jha
March 23, 2024 10:11 IST
दुनिया मेरे आगे  होली है प्रेम और प्रकृति में लीन होने का त्योहार
प्रतीकात्मक तस्वीर। फोटो -(इंडियन एक्सप्रेस)।
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सरस्वती रमेश

फाल्गुन का महीना मनुष्य और प्रकृति के उत्सव में लीन हो जाने का समय है। इस महीने में प्रकृति में चहुंओर बिखरे रंग हमारे जीवन से एकसार होने को लालायित नजर आते हैं। मानो प्रकृति आह्वान कर रही हो कि आओ रंगों के उत्साह से अपना जीवन इंद्रधनुषी कर लो। प्रकृति का यही हुलास रंगों के त्योहार होली में दिखाई देता है। शायद इसीलिए इसी महीने में भाल पर गुलाल मले रंगबिरंगी होली चली आती है। आह्लाद, उमंग, तरंग का जो संयोजन इस त्योहार में होता है, वह अन्यत्र दुर्लभ है। जैसे समूची सृष्टि ही रंग के आनंद में सराबोर हो उठती है।

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हम रंगों को किसी त्योहार का रूपक मानते हैं। अनेक अर्थों में रंग विभिन्न भावों के प्रतीक भी हो सकते हैं। दरअसल, रंग सिर्फ जीवन के उत्सवधर्मी होने के पर्याय ही नहीं होते, बल्कि इनके पीछे जीवन का पूरा दर्शन छिपा हुआ है। हमारा जीवन अलग-अलग रंगों के मेल से बना हुआ है। एक तरफ हंसी और खुशी के रंग हैं तो दूसरी तरफ दुख और उदासी का। एक तरफ प्रेम और शृंगार का रंग है तो दूसरी ओर बिछोह और करुणा का।

यह विरोधाभास ही तो जीवन की असल परिभाषा है कि जीवन में हर भाव, हर रंग का संतुलन साधना आवश्यक है। किसी एक रंग से न तो जीवन बन सकता है और न जीवन का संपूर्ण रस मिल सकता है। सुख तो तभी पता चलेगा, जब दुख होगा। लेकिन सुख और दुख, अच्छे और बुरे जीवन के रंगों में से हमें चुनाव करना होता है कि हम अपने जीवन में किस रंग की अधिकता रखना चाहते हैं।

आशा और सकारात्मक दृष्टि रखने वाले लोगों के जीवन में हंसी-खुशी के रंगों की अधिकता होती है। ऐसे लोग दूसरों के जीवन में भी खुशी के रंग ही बिखेरते हैं। जबकि नकारात्मक सोच वाले और मन में निराशा का भाव रखने वाले न तो अपनी जिंदगी में कोई रंग भर पाते हैं और न ही दूसरों को कोई खुशी दे पाते हैं। ऐसे लोग तो दूसरों के जीवन में बिखरे रंगों को भी बदरंग करने से गुरेज नहीं करते। निराशा किसी दुख का नतीजा हो सकती है, मगर उससे निकलने की इच्छा एक सहज भूख है। खुशी वह रास्ता मुहैया कराती है।

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हमारे रिश्ते भी प्रकृति में रंगों की तरह ही विविधताओं से भरे हुए होते हैं। हर रिश्ते का अपना रंग और अपनी तासीर होती है। माता-पिता, भाई-बहन, पति-पत्नी, बच्चे- इन सभी रिश्तों में हमारी अलग-अलग संवेदनाओं के रंग बिखरे होते हैं। पर जिस तरह होली के तमाम रंगों का मकसद सबको एक ही रंग में रंगना होता है, ठीक उसी तरह हमारे सभी संबंध हमारी जिंदगी में खुशियों के रंग बिखेरने और हमारी जिंदगी को रंगीन बनाने के लिए होते हैं।

हमारे रिश्ते प्रेम और मर्यादा के बंधन से बंधे होते हैं। हालांकि बात जब होली की हो रही हो तो रिश्तों की परिभाषाएं बदलते देर नहीं लगती। फाल्गुन में कई बार रिश्तों के दायरे नई शक्ल अख्तियार कर लेते हैं और कई बार मर्यादाओं के बांध भी तोड़ दिए जाते हैं। होली त्योहार ही ऐसा है। इसके रंग में जो रंगा सब भूल जाता है। कुछ याद रहता है तो बस आनंद। हालांकि यह भी कड़वा सच है कि कई बार महिलाओं को आनंद के त्योहार में असुविधाजनक स्थितियों का सामना करना पड़ता है। इस पहलू से देखें तो समाज को अभी स्त्रियों के प्रति संवेदनशीलता की कसौटी पर और प्रशिक्षित होने की जरूरत है।

रंगों का उत्सव होली प्रेम और मिलन का अवसर है। अपनी अपनी बंद कोठरियों से निकलकर ढोल मंजीरे की थाप पर सामूहिक नृत्य करने और वर्ष भर के अवसाद अकेलेपन उदासी को धो डालने का समय। जिंदगी की व्यस्तताएं इतनी बढ़ गई हैं कि हम सुविधाओं से घिरे और उल्लास से विहीन होते जा रहे हैं। होली हमारे इसी अभाव को दूर करने के लिए आता है। अपनों का जमघट लगता है। गीत गाए जाते हैं। अच्छे-अच्छे पकवान बनते हैं। दुश्मनों से गले लगाकर उनसे दोस्ती बनाई जाती है। पराए भी अपने हो जाते हैं और हमारे नीरस उदास जीवन में रंगों का सरस मेला लग जाता है।

होली के हुड़दंग में मन की कुंठा, ईर्ष्या बैर, भेद, ऊंच-नीच की भावना, अमीर-गरीब का अंतर सबकी होली जल जाती है। मन से सारे दूषित विचार निकल जाते हैं। हमारा शरीर नए मन को धारण कर लेता है। नया मन, जिसमें भाईचारा हो, प्रेम हो, बड़ों के लिए सम्मान छोटों के लिए दुलार हो और रिश्तों के प्रति आत्मीयता हो। असल में त्योहारों के बहाने रिश्तों में प्रेम अपनत्व के रंग भर कर उन्हें फिर से हरा-भरा किया जाता है।

सच तो यह है कि ये रंग न होते तो दुनिया में हंसी, खुशी, आशा उम्मीद के मायने भी न होते। फूलों की खूबसूरती न होती। हरियाली न होती। नदी, पहाड़, आकाश सब बदरंग होते। दरअसल, रंग तो हमारी उदास दिनचर्या में लरजते दीपक के समान होते हैं। इसीलिए होली पर एक दूसरे को रंग लगाते समय होठों पर हंसी दौड़ी चली आती है। हमारे जीवन की सारी निराशा को एक रंग भरी पिचकारी धो देती है।

सारी थकान मिटा देती है और जिंदगी जीने के लिए हमारे भीतर नया जोश भर देती है। होली मौसम में बदलाव का भी आगाज करता है। ऐसे वक्त में जरूरत है कि हम सब भी अपनी सोच में बदलाव लाकर जीवन में सकारात्मकता लाने की पहल करें। इस खुशहाली भरे पर्व में लड़ाई-झगड़ा, दंगा-फसाद कर इसके रंग को बदरंग न किया जाए।

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