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दुनिया मेरे आगे: आयु का बढ़ना, समय का हाथ से फिसलने जैसा

अतीत में किसी मोड़ पर लिए गए गलत निर्णय के प्रति ऐसा क्यों लगता है कि काश उस समय अक्ल आ गई होती। कई लोग अपने बचपन या अपनी युवावस्था के सुखों को स्मरण करके आहें भरते हैं। कुछ ज्ञानी अतीत में जाने से साफ इनकार कर देंगे, क्योंकि चीजें एक ‘पैकेज’ के रूप में मिली हैं।
Written by: जनसत्ता | Edited By: Bishwa Nath Jha
नई दिल्ली | May 31, 2024 10:36 IST
दुनिया मेरे आगे  आयु का बढ़ना  समय का हाथ से फिसलने जैसा
प्रतीकात्मक तस्वीर। फोटो -(सोशल मीडिया)।
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ट्विंकल तोमर सिंह

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भय सबके अंदर किसी कोने में बैठा है। असफलता का भय, किसी के ऊपर प्रभाव न छोड़ पाने का भय, अपनों से अलग होने का भय, धन चले जाने का भय, सत्ता चले जाने का भय। पर एक निश्चित आयु पार कर लेने के बाद इंसान का सबसे बड़ा भय होता है- जीर्ण होना। जीर्णता जो शरीर के पोर-पोर में झलकने लगती है। ऊर्जा क्षीण होने लगती है, उल्लास पहले जैसा नहीं रहता।

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आने वाला जन्मदिवस अब उसे उतना हर्षित नहीं करता, जितना पहले किया करता था। वह बचता है कैलेंडर में अपने जन्मदिवस की तारीख को पास आते देखने से। वह कतराता है दर्पण में चेहरे की झुर्रियों को देखने से। जाने किस गोपनीय विधि से प्रकृति कार्य करती है कि प्रतिदिन वही चेहरा दर्पण में दिखता है, पर वर्षों पहले ली गई तस्वीरें बताती हैं कि दर्पण ने झूठ बोला, चेहरा तो बदल गया।

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अभी ही तो हमने जीवन को समझा था, जीवन जीने की कला सीखी थी, कुछ रस चखे थे और इतनी जल्दी जीवन का प्रक्षेपण पथ पूर्ण होने को आ गया। काश कोई विद्या होती, कोई तो तंत्र होता कि समय बांध कर रख लिया जाता। आयु का बढ़ना, समय का हाथ से फिसलते जाना क्या इतना बुरा है कि समय को बांध कर रखने की इच्छा को मन में स्थान दिया जाए?

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विचार किया जाए कि घड़ी को हाथ में बांध लेने से समय भी मुट्ठी में बंद हो जाता तो कैसा होता? सबका अपना समय अपनी मुट्ठी में। जैसे चाहे वैसे खर्च करें। पर समय का रुकना ऐसा होता, जैसे एक कक्ष के सारे किवाड़, सारे रोशनदान, सारी खिड़कियां बंद हों, हवा रुंध जाए। दृश्य कितना भी सुंदर हो, उसे सदा के लिए निहारा नहीं जा सकता। उससे भी मन विरक्त हो जाता है।

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आमतौर पर लोग बीते हुए सुख के पलों को स्मरण करके वर्तमान से असंतुष्ट रहते हैं। बीता यौवन उन्हें जीवन से रूप, बल, शक्ति और स्वास्थ्य संपदा के ह्रास का अहसास कराता रहता है। सफेद होते बाल, आंखों पर चश्मा, माथे पर लकीरें, चेहरे पर ताजगी की कमी, हम तो ऐसे पहले न थे। पीछे मुड़कर देखने पर हम पाते हैं कि हम बीते वर्षों में कितने प्रसन्न थे। चिंताएं कम थीं, कर्तव्यों के बोझ ने हमारी रीढ़ को टेढ़ा नहीं कर रखा था, सामाजिक मान-सम्मान की चाह नहीं थी। हमारे पास आशाओं का एक सागर लबालब भरा था।

हमने दुख के थपेड़े नहीं देखे थे। हमारी न केवल आयु कम थी, सपने अधिक थे। हम उन्मुक्त होकर संसार का सुख लेते थे। पर अपने अंदर एक प्रश्न का उत्तर टटोल कर देखें- क्या आत्मा में ये निखार था? दुखों को सहने के लिए आवश्यक लचीलापन मेरुदंड में था? क्या हम इतने सशक्त थे कि संघर्षों की आंधी हमें तिनके की तरह उड़ा न सके? हर परिस्थिति को संयत रहकर झेल सकने की युक्ति बुद्धि में थी? बिरला ही कोई होगा जो यह बात दृढ़ता से कह सकेगा कि दस वर्ष पूर्व भी वह उतना ही परिपक्व था जितना कि आज।

हमने देखा कि शरीर बूढ़ा होता जाता है, पर हम यह नहीं अनुभव कर पाए कि आत्मा हर दिन नया अनुभव, नया ज्ञान पाकर, नई परीक्षाओं से गुजर कर और युवा होती जाती है। आत्मा अपनी पूर्णता और प्रबलता की ओर निरंतर यात्रा कर रही थी। क्यों हमको बीते समय में की गई मूर्खताओं पर विक्षोभ होता है? अतीत में किसी मोड़ पर लिए गए गलत निर्णय के प्रति ऐसा क्यों लगता है कि काश उस समय अक्ल आ गई होती।

हममें से कई लोग ऐसे होंगे जो अपने बचपन या अपनी युवावस्था के सुखों को स्मरण करके आहें भरते हैं। कुछ ज्ञानी ऐसे भी मिलेंगे जो अतीत में जाने से साफ इनकार कर देंगे, क्योंकि चीजें एक ‘पैकेज’ के रूप में मिली हैं। ‘टाइम ट्रैवेल’ यानी ‘समय की यात्रा’ करके अतीत में पहुंच गए तो आज की बुद्धि के संग नहीं पहुंचेंगे। ज्ञान, अनुभव, परिपक्वता भी तो चली जाएगी। प्रसिद्ध अमेरिकी निर्माता निर्देशक वाल्ट डिज्नी का कहना है- ‘बूढ़ा होना अनिवार्य है, लेकिन परिपक्व होना वैकल्पिक है!’

दुख चाहे आज मिले या कल, यह एक वरदान ही है! सुख मात्र अच्छे कर्मों के पुरस्कार के रूप में मिलता है। वह भोग कराता है, कुछ सिखाता नहीं है। दुख, पीड़ा, बढ़ती वय से शरीर भले ही पीला पड़ता जाए, आत्मा हरी होती जाती है। यों, जैसे बीज के दल सूख जाते हैं और अंकुर पनपता जाता है। हमें इसी बिरवे को पोषित करना है, बीज का दल सूख गया, इसका मातम नहीं मनाना है। आयु बढ़ने के कुछ कठिन और अप्रिय पहलू हैं, पर इन्हें बढ़ती उम्र के कुछ शानदार पहलुओं पर हावी नहीं होना चाहिए।

एक अध्ययन में पाया गया कि मध्यम आयु वर्ग के लोगों की अपेक्षा वरिष्ठ आयु वर्ग के लोग अधिक प्रसन्न रहते हैं। इस विषय पर लेखक सेवेरियो स्ट्रेंजेस कहते हैं, ‘यह बेहतर संघर्ष कर पाने की क्षमताओं के कारण हो सकता है। वृद्ध लोगों में परेशानियों या नकारात्मक परिस्थितियों से निपटने के लिए आंतरिक तंत्र होते हैं, जो युवा लोगों की तुलना में बेहतर होते हैं।’

सुप्रसिद्ध लेखक चार्ल्स डिकेंस का कथन है- ‘हमें अपनी आयु अपने अंदर होने वाले परिवर्तनों से गिननी चाहिए, न कि वर्षों से।’ तो अपने अंदर आए परिवर्तनों से आयु नाप कर देखने पर पता चलेगा कि अभी तो कुछ उम्र गुजरी ही नहीं। सोच कर देखा जाए, ईश्वर कितना दयालु विनिमय व्यापारी है कि अगर वह हमसे कुछ लेता है तो बदले में उतनी ही गुणवत्ता की कोई अन्य वस्तु हमें प्रदान कर देता है। वह चुपके से शरीर की प्रबलता को आत्मा की प्रबलता से प्रतिस्थापित कर देता है और हमें आभास भी नहीं होता। सब कुछ कितना गोपन विधि से हो रहा है हमारे ही भले के लिए, पर हम समझ ही नहीं पाते।

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