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दुनिया मेरे आगे: अंतर्मन में रंगोत्सव, प्रकृति के लिए हर दिन है होली, जहां उल्लास है, वहीं है ऊर्जा, वहां रोज फागुन

हमारी चेतना का स्वभाव ही उत्सव का है। उत्सव के साथ रंग को जोड़ दिया जाए, तो वह पूर्ण हो जाता है। वसंत का मौसम रंगों के उत्सव का है। इसमें रंग पंचमी है, रंग एकादशी है, तो वसंत पंचमी और होली है। प्रकृति और मानव मन में फगुनाहट का रस और रंग समाया रहता है। पढ़ें मयंक मुरारी के विचार।
Written by: जनसत्ता
नई दिल्ली | Updated: March 25, 2024 03:59 IST
दुनिया मेरे आगे  अंतर्मन में रंगोत्सव  प्रकृति के लिए हर दिन है होली  जहां उल्लास है  वहीं है ऊर्जा  वहां रोज फागुन
प्रकृति और मानव मन में फगुनाहट का रस और रंग समाया रहता है।
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हमारी चेतना में अहर्निश होली चल रही है। रंगों का उत्सव जारी है। सांसारिक रूप से होली का उत्सव अंतर्मन पर लगातार चलने वाली तन, मन और चिंतन के सरस की ओर इंगित करता है। यह प्रेम के आरोहण और उसके प्रकटीकरण का पर्व है। हमारी चेतना में प्रवाहित विविध रंगों का उत्सव है। इसमें रंग ही रंग है। यह अंतर्मन में रिसता रहता है और तन के कोर-कोर को भिगोता रहता है।

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प्रकृति स्वतंत्र है, इस विराट में मानव को छोड़कर सब खुद स्वावलंबी है

होली का तात्पर्य है- रस के साथ रंग। अस्तित्व में सदैव उत्सव है। इस विराट में प्रतिदिन होली मनाई जाती है। प्रकृति में, आकाश में, सूर्य की किरणों में रंगों का उत्सव सुबह से शाम तक चलता रहता है। रोजाना ही प्रकृति में रंग छिटकते हैं। प्रतिदिन बहुरंगी फूल खिलते हैं। हर नए कोंपल और झरते पत्ते के साथ रंगों का रस हमारे मन पर चढ़ता है। रंगों का यह प्रवाह ही होली है। हम मानव के लिए साल में एक होली, एक दिवाली है। मगर प्रकृति सदैव उत्सव मनाती है। इस विराट में जंगल, पौधे, पशु, नदियों का कोई अलग से होली का दिन नहीं है। उनका पूरा जीवन ही होली है, हर दिन उत्सव है। प्रकृति स्वतंत्र है, इस विराट में मानव को छोड़कर सब खुद स्वावलंबी है, इसलिए उनके जीवन में सदैव ऊर्जा है। ऊर्जा से परिपूर्ण अस्तित्व को अलग से उत्सव की जरूरत नहीं है।

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स्वाभाविक मानव जीवन ही फागुन है। जीवन में संगीत का संचार हो, गीत की धुन बजे और नृत्य का भाव हो, इसलिए उत्सव है। उत्सव हमारे जीवन में पुलक लाने के लिए है। इससे जीवन प्रसन्न हो, मुदित बने और थिरकन आए। होली केवल बाहर की नहीं, अंदर की भी होली है। जिस प्रकार मन के सभी विकारों और आसक्तियों को जलाना ही होलिका दहन है, उसी प्रकार चेतना को रस रंग में सराबोर करना ही होली है। कृष्ण के साथ वृंदावन में होली का महारास है तो राम के साथ मर्यादा का आरोहण है। यह भी चेतना को शाश्वत रंगीन बनाने की यात्रा है। फिर महादेव के साथ अनंत होली है। शिव होली है। होली में शिव ही रंग हैं। यानी जो शुभ है, श्रेष्ठ है, उससे अपनी चेतना का आरोहण कराना। अंतर्मन को रंगीन करना। इसमें शांति का सफेद, प्रेम का लाल, करुणा का नारंगी और उल्लास का हरा समावेशित है।

प्रेम के रंग से परम की प्राप्ति होती है, तो होली के साथ सब रंग का संयोजन निश्चित ही व्यक्ति को प्रेम के विविध सोपान तक पहुंचाता है। होली के रंग उत्सव रचते हैं। दिल में उमंग बढ़ाते हैं। कुंठा से मुक्त करते हैं। भेद मिटाकर सभी को अभेद रूप से अभिन्न कर देते हैं। भारतीय संस्कृति में मुक्ति के लिए मन, वचन, कर्म और ध्यान को माध्यम बताया गया है। होली ही ऐसा उत्सव है, जिसमें प्रेम रस में मन सराबोर रहता है। इसकी सप्तरंगी छटा में विचारा निमग्न होता है और उसके सांस्कृतिक और सामाजिक धारा के साथ कर्मयोग की साधना चलती है।

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होली जीवन कर्म है, तो उसकी अंतर्यात्रा से मन और वचन की वर्जनाओं को नया अर्थ देने का माध्यम है। होली देह को नहीं, बल्कि अंतस को भिगोता है। देह पर रंग की बरसात को इंद्रियां अनुभव करती हैं और मन तथा वचन पर होली का सुवास हमारी आत्मा का आस्वाद बनता है। सच है कि कुछ अवांछित गतिविधियों की वजह से होली जैसे त्योहार को फीका करने की कोशिश की जाती है। जिन्हें असुविधा है, उन्हें दुख पहुंचा कर तो खुशी के रंग नहीं चुने जा सकते। हां, उनकी खुशियों के साथ खड़े होकर खुशी के नए रंगों की खोज कर सकते हैं।

ईश्वर की ओर गमन का सरल मार्ग प्रेम और भक्ति का मार्ग है। इसमें होली का रंग अद्भुत है। इसमें प्रेम है, उमंग है और भक्ति भी है। होली की अपनी मस्ती है। इसका अपना ठाठ है। इसका अपना फाग है। सब ओर रस, रंग और लास्य का महा उत्सव है। सूरदास की पंक्तियां हैं- ‘हरि संग खेलत हैं सब फाग। इहिं मिस करति प्रगट गोपी, उर अंतर को अनुराग।’

यह धरती का उत्सव है और धरती अपने सप्तरंगी आभा और छंटा से पूरी वसुधा को रंगीन बनाए हुए है। होली गोपियों के वृंदावन से प्रेमरस के साथ चलती है और अवध के लोक में चिंतन रस को पसारती है। फिर काशी में गंगा के किनारे मसाने पर पूरे अंतर्मन को रंगीन कर देती है। यह संसार रंग से परिपूर्ण है, इसलिए जीवन को भी रंगों से भरा होना चाहिए। हरेक व्यक्ति भी रंगों का समुच्चय है। हमारी चेतना का स्वभाव ही उत्सव का है। उत्सव के साथ रंग को जोड़ दिया जाए, तो वह पूर्ण हो जाता है।

वसंत का मौसम रंगों के उत्सव का है। इसमें रंग पंचमी है, रंग एकादशी है, तो वसंत पंचमी और होली है। प्रकृति और मानव मन में फगुनाहट का रस और रंग समाया रहता है। एक तरफ प्रकृति की सप्तरंगी छटा और दूसरी आर मानवीय जीवन में भौतिक सुख का बहुरंग समाज में उल्लास बिखेरता है। फागुन और चैत को वसंत का माह माना जाता है। इस प्रकार हिंदू कैलेंडर में साल का अंत और नए साल की शुरुआत वसंत से होती है। यह माह सात्विक शक्तियों की विजय का प्रतीक है। प्रह्लाद का होलिका पर विजय इसका सुंदर उदाहरण है। होली में कई रंग सिमटे हैं। यह राधा और कृष्ण के मिलन, बाबा विश्वनाथ और पार्वती के अनन्य प्रेम और समूचे समाज की खुशी और सद्भाव का उत्सव है।

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