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दुनिया मेरे आगे: अकेलेपन के दंश को झेलने के लिए परिवार मजबूर

भारतीय सभ्यता के विकास की शुरुआत से लेकर अब तक के कालखंडों पर गौर करें तो पाएंगे कि हमेशा से परिवार और सामाजिकता केंद्र में रही है।
Written by: जनसत्ता | Edited By: Bishwa Nath Jha
नई दिल्ली | Updated: February 24, 2024 11:19 IST
दुनिया मेरे आगे  अकेलेपन के दंश को झेलने के लिए परिवार मजबूर
प्रतीकात्मक तस्वीर। फोटो -(फ्रीपिक)।
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संगीता सहाय

कुछ दिनों पहले आई खबर के मुताबिक, अपने जीवन के सात दशक पूरे कर चुके एक प्रोफेसर ने घरेलू क्लेश से आहत होकर फांसी लगा ली। उनके आसपास के लोगों ने बताया कि उनके घर में आए दिन झगड़े होते रहते थे और इसी वजह से उन्होंने आत्मघाती कदम उठाया। मगर घरेलू कलह के मुकाबले लंबे समय से इंजीनियर, डाक्टर और अन्य ‘शैक्षणिक उत्पादों’ का फैक्ट्री बना कोटा आज वहां अपने स्वप्न लिए पहुंचे युवाओं की आत्महत्या के एक केंद्र के रूप में जाना जाने लगा है। समाज के अन्य क्षेत्रों में भी ऐसी दुखद घटनाओं की संख्या बढ़ती ही जा रही है।

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ये तादाद स्त्री-पुरुष, शिक्षित-अशिक्षित, गरीब-अमीर सहित समाज के हर स्तर के लोगों में बढ़ी है। मुद्दा या क्षेत्र कोई भी हो, समाज के अलग-अलग हिस्सों और परिवेश से जुड़े लोगों के जीवन से पलायन की तस्वीरें निश्चित रूप से चिंताजनक हैं। लोगों में बढ़ती आत्मघाती प्रवृत्ति सोचने के लिए विवश करती है कि हमारी दशा क्या है और दिशा किस ओर है। बदलाव के जिस बयार का ख्वाब हमने देखा था और उसके लिए विकास की जिन राहों को हमारे समाज, सरकार और व्यवस्था ने स्वीकार किया, वह कितना सही और कितना गलत है!

भारतीय सभ्यता के विकास की शुरुआत से लेकर अब तक के कालखंडों पर गौर करें तो पाएंगे कि हमेशा से परिवार और सामाजिकता केंद्र में रही है। लोगों ने बड़ी से बड़ी भवबाधाएं इसी के लिए और इसी की बदौलत पार की है। यहां कभी भी परिवार का मतलब पति-पत्नी और बच्चे के सीमित संदर्भों में नहीं रहा है।

परिवार के संदर्भों में माता-पिता, बच्चे, दादा-दादी, नाना-नानी, बुआ, ताया-ताई और उनसे जुड़े तमाम लोग रहे हैं। व्यक्तिवाद तो हमारी जड़ों में नहीं रहा है। ऐसी बनावट वाले भारतीय समाज में बढ़ता व्यक्तिवाद, टूटता परिवार और खत्म होता सामाजिकता का भाव बढ़ती आत्महत्या के सबसे मुख्य कारणों में से एक है।

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बाजारवाद ने व्यक्तिवाद को बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभाई है। चूंकि उसके फायदे इसी में निहित हैं, इसलिए वह इसे ज्यादा से ज्यादा बढ़ाने में रत है। यह व्यक्ति और समाज के ऊपर इस हद तक हावी हो चुका है कि उसके द्वारा निर्मित कृत्रिमता को ही लोगों ने सच मानकर जीवन जीने का रास्ता बना लिया है।

आत्मकेंद्रित व्यक्ति छोटी समस्या को भी बड़ा मानकर उसमें घुलने लगता है। वह अपने मन के भावों को परिवार या मित्रों के साथ भी साझा नहीं कर पाता। गौरतलब यह भी कि आज लोग स्वयं में इतना मग्न हैं कि दूसरों की जरूरतों पर ध्यान देने की उन्हें फुर्सत भी नहीं है। ऐसी व्यस्तता में ही उन्हें गर्व की अनुभूति होती है।

आज कई लोग सहजता से यह कहते मिल जाते हैं कि ‘मेरे पास तो पल भर की फुर्सत नहीं है’। लोगों के पास अपने माता-पिता और घर के अन्य सदस्यों के लिए भी समय नहीं है। वे इसकी पूर्ति महंगे उपहारों, मोबाइल से बातचीत, वीडियो काल आदि के द्वारा करने का प्रयास करते है।

वे यह समझने की कोशिश नहीं करते की अपने प्रियजनों का स्नेह भरा साथ महंगे उपहारों से बहुत ऊपर है। एकाकीपन कई लोगों को मानसिक रूप से बीमार और कमजोर बना देता है। उन्हें ऐसा लगता है कि परिवार को उनकी कोई फिक्र नहीं है, बल्कि सिर्फ उनके पैसे से जुड़े हैं। ऐसे में वे आसानी से आत्मघाती कदम उठा लेते हैं।

बच्चों को बालपन से ही सहज, स्वाभाविक जीवन जीने की कला सिखाने के बजाय उन्हें बनावटी जीवन का आदी बनाना, खेलकूद, प्राकृतिक वातावरण, दोस्तों से दूर कर असमय ही प्रतिस्पर्द्धा के अंतहीन दौर में शामिल होने के लिए प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से उकसाना, बच्चों के कोमल मन-मस्तिष्क में अपने अधूरे सपने के बीज बोकर उन्हें पूरा करने की कोशिश करना, जिस उम्र में बच्चों के कदम लड़खड़ाने का सर्वाधिक डर होता है और सबसे ज्यादा माता-पिता और बड़ों के साथ की जरूरत होती है, उम्र के उस दौर दौर में उन्हें पढ़ाई के नाम पर घर से दूर भेज देना और कुल मिला कर अकेलापन आज युवाओं के बिखरने, भटकने और नशे का आदी बनने का बड़ा कारण है।

किशोरवय में माता-पिता के स्नेहिल छांव की सर्वाधिक आवश्यकता होती है। परिवार की राह दिखाती बातें, सही संगति और बेहतर वातावरण बच्चों को किसी भी मनचाही मंजिल के करीब ले जा सकता है। इसकी कमी तमाम शैक्षणिक संस्थानों और संसाधनों की उपस्थिति के बावजूद भटकाव और आत्महत्या की ओर ले जाता है। कोटा और उस जैसी तमाम जगहों पर अगर एक तरफ शिक्षा का बाजार खड़ा है, तो दूसरी तरफ बहुत हद तक उसी के समांतर नशा और अन्य कुकृत्यों का काला बाजार भी है।

एक का मकसद शिक्षा को वस्तु बनाकर बेचना है, तो दूसरे का मकसद कैसे भी युवाओं को भटकाकर अपना माल बेचना है। घर-परिवार और अपनों से दूर बहुत सारे युवा बच्चे पढ़ाई और अनचाहे सपनों के बोझ से थके, ऊबे कब इन बहेलियों के चंगुल में फंस जाते हैं, वे नहीं जान पाते। अक्सर जब तक वे ऐसे जाल को समझते हैं, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। यह आत्महत्या की एक बड़ी वजह बनती है।

बहुत सारे बच्चे परिवार के दबाव में आकर उन विषयों को चुन लेते हैं, जो उनकी रुचि का नहीं होता। नतीजतन, तमाम प्रयासों के बावजूद वे सफल नहीं हो पाते। ऐसे में असफलता और मां-बाप के सपनों को पूरा न पाने का दंश कई बार उन्हें मौत की ओर ले जाता है। जबकि आत्महत्या की त्रासदी को रोकने का अहम रास्ता है परिवार का मजबूत साथ। यही लोगों को कठिन परिस्थितियों से बाहर निकालकर उन्हें सहज जीवन जीने की शक्ति दे सकता है।

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