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दुनिया मेरे आगे: वक्त का बहाना और फुर्सत की विदाई; अपनों के लिए न तो इच्छा बची और न ही कोशिश

आस-पड़ोस की तो दूर, हमारे पास अपने भी छोटे और मासूम बच्चों के लिए वक्त ही नहीं है। उन्हें भी हम मोबाइल, टीवी आदि के साथ लगा देते हैं। हमारी वृद्ध मां की आंखें कभी घर पर तो कभी गांव में अकेले रहते हुए हमारा इंतजार करती हैं, लेकिन हम उन्हें अपने आने की रोशनी कभी नहीं दे पाते। पढ़ें रितुप्रिया शर्मा के विचार।
Written by: जनसत्ता
नई दिल्ली | Updated: May 27, 2024 14:03 IST
दुनिया मेरे आगे  वक्त का बहाना और फुर्सत की विदाई  अपनों के लिए न तो इच्छा बची और न ही कोशिश
खुद के लिए फुर्सत का पल निकालना बहुत मुश्किल है। (Image credit: Surabhi Yadav)
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आज जिंदगी की व्यस्तता कुछ इस तरह की होती गई है कि लगातार हम उस वक्त की तलाश में घूम रहे हैं, जो हमें थोड़ी फुर्सत दे। फुर्सत उन लम्हों को जीने की, जो हमारे अपने हैं, लेकिन इन लम्हों के लिए हमारे पास वक्त ही नहीं बचा है। आज हर आदमी यही कहता फिर रहा है कि सब है, पर वक्त नहीं है। वक्त कहां से लाऊं? एक दिन के पूरे चौबीस घंटे भी कम पड़ रहे हैं। समूचा वर्ष कैसे निकल गया, पता नहीं चला! अक्सर लोग कहते हैं कि नौकरी के दिन के तौर पर सोमवार की शुरुआत हुई नहीं कि कब रविवार आ गया और उस दिन भी राहत के पल की खोज होने लगी, यह पता नहीं चला। ये कुछ ऐसे हालात हैं, जो हम रोजमर्रा की जिंदगी में लगातार बोल रहे हैं या किसी को बोलते हुए सुन रहे हैं।

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हर समय जल्दी और जल्दी, कभी समय नहीं रहता

हम सभी ने हमारी फुर्सत को अपने घर से या अपने दायरे से रुखसत कर दिया है। फुर्सत के लिए कोई शायद कोई कोशिश भी नहीं है। सुबह काम पर जाने की जल्दी, शाम को घर आने की जल्दी, फिर घंटों टीवी या मोबाइल से बात करने की जल्दी। जैसे इन संसाधनों में ही हमारी आत्मा बसती हो। और इस पर भी शिकायत कि वक्त नहीं मिलता। सवाल है कि हम अपनी नौकरी या रोजगार से बचे तमाम वक्त को तकनीकी संसाधनों में झोंकने के बाद यह कैसे कह पाते हैं कि वक्त की कमी है!

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पहले का दौर, जिसमें लोग चौपालों, चबूतरों, मैदान में आराम से बैठ कर बातें करते दिख जाते थे या फिर खुली सड़क पर घूमते दिखते थे, अब वह कहीं नहीं है। अब एक बंद और दौड़ती हुई दुनिया हमें नजर आती है। बंद ऐसे कि घर आने के बाद बाहर किसी से नहीं मिलना-जुलना और दौड़ती हुई ऐसे कि सब कुछ पाने की बदहवास चाहत। सब कुछ पाकर भी ऐसा खालीपन, जिसे हम सभी कभी न भर पाए।

बच्चे रोते हैं तो हम उन्हें मोबाइल दे देते हैं, बात नहीं करते हैं

क्या हो गया है हमें? हम अपने साथ ये क्या करना चाहते हैं? आस-पड़ोस की तो दूर, हमारे पास अपने भी छोटे और मासूम बच्चों के लिए वक्त ही नहीं है। ज्यादा रोते देख कर उन्हें भी हम मोबाइल, टीवी आदि के साथ लगा देते हैं। हमारी वृद्ध मां की आंखें कभी घर पर तो कभी गांव में अकेले रहते हुए हमारा इंतजार करती हैं, लेकिन हम उन्हें अपने आने की रोशनी कभी नहीं दे पाते। कारण के तौर पर उसी बात का रोना है कि हमारे पास समय नहीं है।

जिस पिता ने पूरी जिंदगी अपनी एक-एक चाहत दबाकर निकाल दी, हर रोज हमारे पालन-पोषण से लेकर भविष्य तक के लिए सोचा, अपने दोस्तों, परिचितों से बात की, सही जगह पहुंचाने के लिए हर संभव उपाय किए, उससे दुम दबाकर निकलने में हम अपनी भलाई समझने लगे हैं, क्योंकि हमारे मुताबिक हमारे पास इतनी फुर्सत नहीं है कि हम उनके दर्द को समझ सकें।

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अपने फायदे के लिए भले ही हमें हजारों किलोमीटर दूर विदेश जाना पड़ जाए, हम जाते हैं, फुर्सत भी निकाल लेते हैं, मगर मां-पिता के पास कुछ पल गुजारने के लिए वक्त नहीं है। जिस काम के लिए हमें पैसा और शोहरत मिलती है, वहां के लिए हमारे पास खूब वक्त है, मगर जिन चीजों में हमें ये दोनों ही चीजें नहीं मिलती, वहां के लिए हमें फुर्सत नहीं है।

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ये बात बिल्कुल ठीक है कि इस प्रतियोगी युग में आगे बढ़ते रहने के लिए हमें अपने आप को भी बुलाना पड़ता है, मगर क्या हम यह सही कर रहे हैं? हमने अपने सारे रिश्तों को तिलांजलि देकर क्या कुछ हासिल किया है? ये कुछ हासिल करने की दौड़ ही हमें सब कुछ खो देने को मजबूर कर देती है। पहला सवाल यह है कि क्या हासिल किया, दूसरा अपनी पसंद का अगर कुछ हासिल कर भी लिया तो उसे हासिल करना ही काफी नहीं होता।

उसको बरकरार रखने के लिए भी हमें अपना दम-खम लगाना पड़ता है। अब उसे बनाए रखने के लिए जो जोर लगाना पड़ता है, वह हमें अंधी दौड़ की ओर ले जाता है। कोशिश करें, लाभ उठाएं, जीवन के हर क्षेत्र में आगे भी जाएं, पर अपने आप को, परिवार को और समाज को न भुला दें। इसका कारण है कि यही नींव का वह पत्थर है, जिस पर हम टिके हैं। नींव हिली तो हम भी कही के नहीं रहेंगे।

यह हमारा भुलावा है कि हम समय नहीं होने की दुहाई लगाते रहेंगे और हमारे लिए दूसरे लोग हर बार हर जगह मौजूद ही रहेंगे। किसी न किसी दिन उनका धैर्य भी टूटेगा और वे अपने- आप को हमसे अलग-थलग कर लेंगे। दिन के चौबास घंटे कोई मामूली अवधि नहीं होती। उसका सदुपयोग कैसे करना है, अपने आपको, परिवार को और समाज को वक्त कैसे देना है, इसका एक प्रारूप अपने दिमाग में बना कर रखा जा सकता है। अपने आप को भी उपेक्षित नहीं करना चाहिए, क्योंकि यह हमारी मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है।

पैसा, सत्ता, प्रलोभन, बड़ा आदमी बनना, सब धरे के धरे रह जाते हैं। जब हम किसी मुसीबत में होते हैं, तब हमारे अपने ही हमें रोशनी में लाते हैं। हम प्रेम का पाठ हमारी मां के गर्भ से ही सीखकर आते हैं तो इंसान होने के नाते क्यों न हम अपनी प्राथमिकताओं को बदलें। फिर से वही फुर्सत का दौर लेकर आए, मां का आंचल, पिता का साया, बच्चों का मन- सब कुछ जीत लें। अगर यह जीत लिया तो समझिए कि पूरी दुनिया जीत ली। उनकी प्रार्थनाओं और शुभकामनाओं में इतनी शक्ति होती है कि हमारे भविष्य की राह आसान हो जाएगी और हमें यह नहीं कहना पड़ेगा की फुर्सत नहीं है।

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