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दुनिया मेरे आगे: जीवन में आनंद की कीमत, खुशियों की चाबी और छोटे-छोटे अवसरों का आना

खुशी अगर पानी है तो हमें अपनी सोच ऐसी बनानी होगी कि हम किसी भी हाल में रहें, प्रसन्न ही रहेंगे। ऐसी सोच बनते ही कोई भी दुख हमें ज्यादा देर परेशान नहीं कर पाएगा। ऐसे ही छोटे-छोटे कई उपाय हैं, जिनको करके हम सुखी हो सकते हैं। पढ़ें रेखा शाह आरबी का विचार।
Written by: जनसत्ता
नई दिल्ली | Updated: March 05, 2024 09:32 IST
दुनिया मेरे आगे  जीवन में आनंद की कीमत  खुशियों की चाबी और छोटे छोटे अवसरों का आना
दूसरों के अपराधों की सजा खुद को आखिर क्यों दी जाए। अगर हम मन में मैल और दुर्भावना पाल रहे हैं तो यह अपने आप को ही सजा देने जैसा है।
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कहा जाता है कि हमारे चेहरे की मुस्कान हमारे चेहरे पर ईश्वर के हस्ताक्षर हैं। इसके बावजूद कुछ लोग अपने आप को जरूरी मौकों पर भी मुस्कुराने से रोकते हैं। खुश होने से रोकते हैं। दरअसल, उन्हें लगता है कि उनके जीवन में बेहद दुख है। मात्र कुछ भौतिक संसाधनों के अभाव के कारण उनको अपना जीवन कष्टकारी लगता है। ऐसी स्थिति में यह विचित्र लगता है कि लोग निर्जीव चीजों से सुख की अभिलाषा करने की कोशिश करते हैं। जब निर्जीव चीजों में कोई अपनी भावना होती ही नहीं है, तो वह किस प्रकार किसी के अंदर खुशियां भर सकती हैं। उसे देख कर और उसकी उपयोगिता के मद्देनजर उसकी सुविधा को लेकर थोड़ी देर के लिए राहत तो मिल सकती है, मगर सच्ची खुशी नहीं।

खुशियां तितली जैसी है, भागोगे तो भाग जाएगी, रुकने पर पास आती है

जबकि खुशियां तो एक तितली की तरह होती हैं, जिसके पीछे हम जितना भागते हैं, उतना ही वह आगे आगे उड़ती जाती है। अगर एक जगह हम रुक कर चुपचाप खड़े हो जाएं तो वह खुद हमारे कंधे पर आकर बैठ जाती है, क्योंकि खुशियां भौतिक संसाधनों से नहीं मिलती हैं। खुशियां धन-दौलत और ऐशो-आराम से नहीं मिलती हैं। दुनिया में कोई भी ऐसी चीज नहीं है, जो मानव मन के अंदर आंतरिक खुशी दे सके। सच यह है कि असली खुशी पाने के साधन ये नहीं हैं। बहुत सारे ऐसे लोग हैं, जिनके पास इस तरह के भौतिक साधन और संसाधन उपलब्ध हैं। इसके बावजूद ऐसे लोग खुश नहीं रहते हैं, क्योंकि खुशियां अंदरूनी होती हैं। बाहरी और बनावटी चीजों से खुशी हासिल नहीं की जा सकती।

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खुशी अगर पानी है तो हमें अपनी सोच ऐसी बनानी होगी कि हम किसी भी हाल में रहें, प्रसन्न ही रहेंगे। ऐसी सोच बनते ही कोई भी दुख हमें ज्यादा देर परेशान नहीं कर पाएगा। ऐसे ही छोटे-छोटे कई उपाय हैं, जिनको करके हम सुखी हो सकते हैं। जीवन में हमें दुखी रहना है या खुश रहना है, इसका फैसला किसी बाहरी व्यक्ति को नहीं करना होता है। आखिरकार यह हमें ही अपने अंतर्मन को बताना पड़ता है कि मुझे खुश रहना है, क्योंकि खुशियों का बाहरी व्यक्ति से कोई लेना-देना नहीं है। यह व्यक्ति को खुद तय करना होता है कि हम किस बात पर प्रसन्न होंगे और किस बात पर शोक मनाएंगे।

जब हम प्रत्येक व्यक्ति और प्रत्येक हालत में अच्छाई ढूंढ़ने का प्रयास करने लगते हैं, तब वहीं से खुश रहना भी प्रारंभ कर देते हैं। मान लिया जाए कि हमें खुश रहना है तो सबसे पहले यह करना होगा कि अपनी थोड़ी भी आलोचना होने पर अपने आपको व्यथित करना बंद करना होगा। सबसे बेहतर तो यह होगा कि हम अपनी क्षमता में वृद्धि करें। जब हम हर एक छोटे कार्य में अपनी खुशी तलाशना प्रारंभ कर देते हैं तो खुश रहने के लिए बड़े-बड़े अवसर के मोहताज नहीं रह जाते हैं।

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दरअसल, जीवन में बहुत खुशियों के बड़े अवसर बहुत कम बार आते हैं, लेकिन छोटे-छोटे अवसर प्रतिदिन आते रहते हैं। हर खुशी का एक मूल्य होता है। अगर हम खुशी के बहुत बड़े-बड़े अवसरों के पीछे भागेंगे तो उसका मूल्य भी हमें बड़ा ही चुकाना पड़ेगा। चाहे वह समय के रूप में ही क्यों न हो। हां, यह संभव है कि अगर हमें वह खुशी प्राप्त हो जाती है वह भी बड़ी ही होगी। एक व्यक्ति अपने परिवार को दुनिया भर के भौतिक संसाधनों के रूप में खुशियां देना चाहता है, जिसे कमाने के लिए अपने जीवन का बहुमूल्य समय अपने कामकाज को देना पड़ता है। जितने महंगे भौतिक संसाधनों की अपेक्षा, उतना ही बहुमूल्य समय का व्यय वहन करना पड़ता है।

इसके अलावा, अपने आप को रचनात्मक कार्यों में लगाकर भी अपने आप को प्रसन्न रखा जा सकता है, क्योंकि जब हम कोई रचनात्मक कार्य करते हैं और किसी चीज का सृजन करते हैं तो उसका सृजन हमें आंतरिक खुशी से भर देता है। एक मूर्ति बनाता हुआ मूर्तिकार भी बेहद महत्त्वपूर्ण होता है, क्योंकि वह सृजन कर रहा है।

हमारी खुशियों पर सबसे ज्यादा डाका तब पड़ता है, जब हमारी मानसिक शांति भंग होती है। हमारी मानसिक शांति तब अधिकतर भंग होती है, जब लोग हमारे साथ गलत व्यवहार कर देते हैं। अपनी गलती को चतुराई समझकर बात को स्वीकार भी नहीं करते हैं। इसके बाद उपजी स्थितियों में हम क्रोधाग्नि में जलने लगते हैं। ऐसे में अक्सर हम दूसरों के गलत किए की सजा खुद को देते हैं और दुखी रहने लगते हैं। अगर किसी ने गलत किया है और उसको वह स्वीकार नहीं करना चाहता तो हम कुछ भी नहीं कर सकते हैं। अपनी खुशियों को बरकरार रखने के लिए सबसे अच्छा है ऐसे लोगों को हम माफ करना सीखें और अपनी खुशियों को संभाल कर रखें।

दूसरों के अपराधों की सजा खुद को आखिर क्यों दी जाए। अगर हम मन में मैल और दुर्भावना पाल रहे हैं तो यह अपने आप को ही सजा देने जैसा है। इससे उस व्यक्ति का कुछ भी बनना बिगड़ना नहीं है। जितनी भी नकारात्मकता पैदा होगी, वह हमारे अपने अंदर पैदा होगी और उसका नफा और नुकसान भी हम को ही भुगतान करना पड़ेगा। इसका सबसे सरल-सा उपाय है उस व्यक्ति को माफ किया जाए और अपने आप को अपनी प्रसन्नता के साथ प्रसन्न रखा जाए। जो इन सभी संसाधनों को अपनी खुशियों की चाबी बना लेता है उसे बाहरी दुनिया में प्रसन्नता और खुशियां ढूंढ़ने की जरूरत नहीं पड़ती है, क्योंकि खुशियां उसके अंदर ही विराजमान है।

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