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दुनिया मेरे आगे: घर के पहरेदार बन कर बुजुर्ग जीने को मजबूर

इन दिनों गुरु-पीरों की धरती की सजावट नौजवानों की खुली हंसी से नहीं, बल्कि बुजुर्गों की नम आंखों से हो रही है। गांव के चबूतरे पर बैठे बुजुर्ग किसी परिचर्चा में डूबकर एक-दूसरे से यही सवाल करते दिखते हैं कि कहां कमी रह गई?
Written by: जनसत्ता | Edited By: Bishwa Nath Jha
Updated: March 13, 2024 10:12 IST
दुनिया मेरे आगे  घर के पहरेदार बन कर बुजुर्ग जीने को मजबूर
प्रतीकात्मक तस्वीर। फोटो -सोशल मीडिया)।
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निधि शर्मा

एक सुनसान बंद पड़ा हुआ दरवाजा और उसके पीछे हजारों ख्वाहिशें, जो चाहती हैं कि ये दरवाजा रोज खुलता रहे। मगर मन या दिमाग में चल रही हसरतों का क्या! वे तो हर दिन जन्म लेती हैं और हर दिन दम भी तोड़ देती हैं। ऐसी हसरत किसी बंद पड़े दरवाजे की भी हो सकती है, जिसे छोड़कर हजारों किलोमीटर दूर अपने सपनों को बड़ा करने के लिए गए परिवार अपनी जड़ों से ही दूर हो जाते हैं। उनके पीछे रह जाते हैं उस घर के एक या दो कमरे में रह रहे अपनी आस की डोर थामे बुजुर्ग, जो बस टकटकी लगाए अपनों के इंतजार में बैठे रहते हैं कि कब उनके अपनों का आना होगा और कब बंद बड़े तालों को खोला जाएगा।

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यह स्थिति आजकल पंजाब सहित देश के कुछ अन्य हिस्सों में बहुत सारे घरों में देखने को मिल जाएगी, जहां शहरों के मुकाबले गांव में बड़े-बड़े घरों में देखरेख करने वाले घरेलू सहायक या उनके परिवार या फिर सिर्फ बुजुर्ग रह रहे हैं जो अपनी अगली पीढ़ियों के लिए घर के रखवाले बन कर रह गए हैं।

गांव में किसी की शादी या फिर सुख के अन्य कार्यक्रम, जो योजनाबद्ध तरीके से आयोजित किए जाते हैं, उसमें तो परिवार की एक या दो पीढ़ियां एक साथ दिखने को मिल जाती हैं, लेकिन जीवन में आने वाली अनियोजित दुख की घड़ी में दुख साझा करने के लिए उस समय सिर्फ बुजुर्गों की पीढ़ी ही नजर आती है। आलम यह रहता है कि विदेश से आने वाली पीढ़ी के इंतजार के लिए लाश को भी मुर्दा घर में बर्फ की सीलियों के बीच और इंतजार करना पड़ता है।

कई बार यह समझना मुश्किल हो जाता है कि सिर्फ ज्यादा सुविधा हासिल करने और उसके बीच जीने और ज्यादा पैसे कमाने के लिए लोग अपनी जमीन से तो टूटते ही हैं, अपने साथ के उन लोगों को पीछे छोड़ जाते हैं, जिन्होंने उनकी जिंदगी को संवारने के लिए न जाने कितने दंश झेले और कैसा समय देखा। मगर फिर यह जटिल तस्वीर यह भी उभर आती है कि बच्चों से लेकर बुजुर्गों के मन में भी ‘आगे बढ़ने’ का जो सपना होता है, उसकी परिभाषा भी यही और ऐसी ही तय की जाती है कि उसमें कुछ बेहद जरूरी लोग हाशिये पर चले जाते हैं।

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इन दिनों गुरु-पीरों की धरती की सजावट नौजवानों की खुली हंसी से नहीं, बल्कि बुजुर्गों की नम आंखों से हो रही है। गांव के चबूतरे पर बैठे बुजुर्ग किसी परिचर्चा में डूबकर एक-दूसरे से यही सवाल करते दिखते हैं कि कहां कमी रह गई? देश का पेट भरने वाले पंजाब के नौजवान को अपने पेट भरने के लिए विदेश का रुख करना पड़ रहा है।

बुजुर्ग अपने अनुभवों के आधार पर बताते हैं कि जब हम छोटे थे, तब खेत-खलिहानों के बीच इकट्ठा होकर खेलते हुए कब बड़े हो गए, पता ही नहीं चला। थोड़े वक्त बाद जब युवा हुए, तब पढ़े-लिखे नौजवान के रूप में सेना में भर्ती होने, शिक्षक बनने और बैंक में नौकरी करने में गर्व महसूस करते थे।

अगर ज्यादा ऊंचे स्तर पर शिक्षित नहीं भी हुए तो खेती करके देश का पेट पालना अपना धर्म समझते थे। मगर आज के युवा का बचपन तकनीक में फंसकर अपनी जड़ों से दूर होकर अपने गांव और देश में न रहकर विदेश में बसना चाहता है। इस कशमकश भरी दुविधा का स्रोत पिछले कुछ समय से बन रहा ऐसा वातावरण है जो युवा के भविष्य को उज्ज्वल होने का प्रमाण पत्र नहीं देता।

दूसरी ओर, बड़े हो रहे बच्चों का सवाल बुजुर्गों से यह है कि क्या हमें भी युवा होने पर हर वाजिब अधिकार के लिए सड़कों पर उतरना पड़ेगा! क्या हमें शिक्षा के बाद रोजगार की गारंटी दी जाएगी? क्या स्वच्छ वातावरण का सपना सुनिश्चित हो पाएगा? इन सवालों के जवाब बुजुर्गों के पास नहीं हैं। ऐसा लगता है कि सरकारों ने भी इस मुद्दे पर हाथ खड़े कर दिए हैं। नारों और वादों में तो सुनहरे पंजाब का नारा सुनाई देता है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि युवा अपने सपने सच करने के लिए विदेश का रुख कर रहे हैं।

सवाल है कि उन सपनों में उन बुजुर्गों की जगह क्या है, जिन्होंने अपनी जिंदगी झोंक कर अपने बच्चों को सपने देखने लायक बनाया? संबंधों का महल अगर भावनाओं की बुनियाद पर टिका होता है, तो उसमें युवाओं की महत्त्वाकांक्षाओं की वह सीमा कहां है, जिसमें भावनाओं और रिश्तों के लिए भी जगह हो?

ऐसे में इस तरह सोचने वाले लोग भी होंगे ही कि काश कोई फरिश्ता आए, जो टूटते युवा और कमजोर होते बुढ़ापे का सहारा बने कुछ ऐसे कि अपनों की मद्धिम होती आंखों से कब रोशनी चली जाए, कहा नहीं जा सकता। इसका इंतजार करने की जरूरत नहीं है। समय रहते समाज और सरकारें इस मसले पर सोचें।

ऐसा न हो कि इस तरह के हालात का सामना करते हुए कोई राज्य सिर्फ बुजुर्गों की आबादी के तौर पर जाना जाने लगे और युवा अनुपस्थित दिखने लगें। कहीं यह नई संस्कृति पनप रही है कि संयुक्त परिवारों को अपने ‘विकास’ में बाधक मान कर युवा पीढ़ी अपने एकल परिवार के दायरे में सिमट रही है, तो कहीं अपनी जमीन ही छोड़ कर बाहर जा रही है।

हालांकि आए दिन हमें बताया जाता है कि भारत युवाओं का देश है और देश इनके ही बूते हर कदम आगे बढ़ा रहा है। काफी हद तक यह बात सही है भी, लेकिन अगर युवा पीढ़ी के होने को देश की ताकत के रूप में देखा-जाना जाता है, तो उनके जीवन को बेहतर और संतोषजनक बनाने की भी जरूरत है, ताकि वे कहीं और जाने की हालत में न पहुंचे।

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