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दुनिया मेरे आगे: सान्निध्य की स्नेहिल छांव से दूर हो रहे बुजुर्ग

एकल परिवार की अवधारणा ने एकल संतान तक ही सीमित रहने की मनोवृत्ति विकसित की है। इसका परिणाम यह है कि एकल बच्चे को जब अपने घर-आंगन में किसी भाई-बहन का साथ नहीं मिलता तो वे बच्चे अपने स्कूल में भी अन्य बच्चों से अधिक मेलजोल नहीं बढ़ा पाते।
Written by: अशोक कुमार | Edited By: Bishwa Nath Jha
नई दिल्ली | Updated: May 23, 2024 10:36 IST
दुनिया मेरे आगे  सान्निध्य की स्नेहिल छांव से दूर हो रहे बुजुर्ग
प्रतीकात्मक तस्वीर। फोटो -(इंडियन एक्सप्रेस)।
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भारतीय सामाजिक परंपराओं की शृंखला में बुजुर्गों की भूमिका अद्भुत रही है। घर आंगन में उनकी उपस्थिति मात्र से ही पूर्व से स्थापित विरासतीय ताने-बाने परिवार में एक सबल और प्रबल तरंग की मनोहर छटा बिखेरे रहती थी। ये बुजुर्ग दादा-दादी और नाना-नानी के रूप में घर के मजबूत स्तंभ माने जाते थे। पूरे परिवार को यह विश्वास रहता था कि पारिवारिक परिवेश में कभी भी प्रतिकूलता आने पर बुजुर्ग अपने दीर्घकाल के अनुभव के आधार पर उसे संभाल लेंगे।

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संयुक्त परिवार के संचालन में बुजुर्गों के निर्णय अंतिम हुआ करते थे, क्योंकि इसके पीछे दूरगामी दृष्टिकोण माना जाता था। कालचक्र के प्रवाह ने जब जीवन अध्याय के सभी पन्नों को पलट कर रख दिया है, तो स्वाभाविक है कि हमारे बुजुर्गों की विभिन्न भूमिकाएं भी बहुत हद तक सीमित हुई हैं। आज की युवा पीढ़ी की तीव्र भागम-भाग की जिंदगी जब अतिशय करवटें बदल रही है, तो यही हमें सचेत भी होने की जरूरत है कि भौतिक व्यामोह की यात्रा में हम इतना आगे न निकल जाएं, जहां से वापसी मुश्किल हो जाए।

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गर्मी की छुट्टी या किसी पर्व-त्योहार में नानी घर जाकर उधम मचाने की एक अलग चंचल घड़ी हुआ करती थी। उन पलों में एक भावनात्मक अनुभूति की सुपाच्य खुराक हुआ करती थी। वर्तमान समय में एकल परिवार की स्थिति ने पुरानी परंपराओं के प्रतिमान रहे नाना, नानी, दादा, दादी के साहचर्य को सीमित कर दिया है।

देश-विदेश में नौकरी करने वाले बेटे-बेटियों का घर आना अब सीमित हो गया है तो बुजुर्ग ही अपनी सुविधा के तहत बच्चों के पास जाकर स्रेहिल वातावरण से जुड़ने की विवशता में हैं। जीवन के सांध्य बेला में जी रहे बुजुर्गों के लिए अब ऐसी स्थिति भी दुर्लभ है, क्योंकि वे उम्रजनित व्याधियों के चलते बाहर आ-जा नहीं सकते। इस परिवर्तन से पूरी दुनिया आक्रांत है, लेकिन बात करें भारतीय सामाजिक संस्कृति की तो कभी बच्चे अपने माता-पिता की एक पीढ़ी पूर्व वाले नाना-नानी, दादा-दादी के साथ रहकर जीवन के वे पूरे सबक सीख लिया करते थे, जिनसे उन्हें भावी जीवन में रूबरू होना पड़ता था।

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देश के कुछ वृद्धाश्रमों में वहां के बुजुर्गों के साथ सप्ताह में एक या दो दिन बच्चे समय बिता रहे हैं। इस प्रयोग से स्नेह और वात्सल्य से वंचित रह गए बच्चों को ऐसे वक्त से सांवेगिक अनुभूति जरूर मिल रही है और इसके अनेक सकारात्मक परिणाम देखने को मिल रहे हैं। मानव सभ्यता के प्रारंभ से ही समाज में संयुक्त परिवार की अवधारणा अपने देश सहित पड़ोसी देशों में भी रही है। ज्यों-ज्यों समाज अपने विकास की यात्रा में गतिमान होता गया, घर-आंगन के सदस्य रोजी-रोटी कमाने बाहर जाने को बाध्य हुए।

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ऐसी स्थिति ने परिवार के बुजुर्गों के लिए विकट एकाकीपन ला दिया है और उनका अकेले रहना उनकी मजबूरी बन गई है। संयुक्त परिवार में छोटे बच्चों का लालन-पालन बड़ी सहजता के साथ हो जाता था और वे मानसिक तौर पर स्वस्थ और प्रसन्न रहते थे। कई शोध पत्रों ने यह निष्कर्ष निरूपित किया है कि जो बच्चे बुजुर्गों की छाया में पलते हुए बड़े होते हैं, उनके व्यवहार में शालीनता और सरलता देखी गई है।

बुजुर्ग बच्चों को सिर्फ प्यार-दुलार से ही मात्र सिंचित नहीं करते, बल्कि एक प्रभावी संस्कार का भी बीजारोपण करते हैं। नानी, दादी की लोरियों के माध्यम से लोक संस्कृति के विविध विधियों से रूबरू कराने की विधा बच्चों के मस्तिष्क पर अमिट छाप छोड़ दिया करती थी। आज भी देखा जा सकता है कि नानी-दादी बच्चों को वात्सल्य की शक्ति पुंज के सहारे पारंपरिक खाने खिलाती हैं।

बच्चे घर के बुजुर्गों के साथ खेल-कूद करते थे, हंसी मजाक करके बहुत कुछ सीख लिया करते थे। बच्चों ने अगर कोई गलती या भूल की तो बड़े-बुजुर्ग उसे तुरंत टोक कर सुधार कराते थे। एक खास बात यह थी कि घर के वरिष्ठ जनों का समय बच्चों के साथ बहुत ही आसानी और तेजी से बीत जाया करता था।

आज के दौर में भी अधिकांश नाना-दादा बच्चों को स्कूल छोड़ने और लाने में अपना समय व्यतीत कर स्वस्थ्य रहकर सदा सक्रिय बने रहते हैं। किस्से-कहानियों के द्वारा बच्चे अपना मनोरंजन भी किया करते थे और अपनी कल्पना शक्ति को विकसित भी किया करते थे। यह विधान समाज के साथ सामंजस्य स्थापित करने में सहायक होता था।

एक अच्छे नागरिक बनने की प्रथम पाठशाला कभी घर ही हुआ करता था, लेकिन वर्तमान में इसके क्षरण और कमी ने इंसान के निर्माण में बेहद कमी ला दी है। एकल परिवार की अवधारणा ने एकल संतान तक ही सीमित रहने की मनोवृत्ति भी विकसित की है। इसका दुष्परिणाम यह हो रहा है कि एकल बच्चे को जब अपने घर-आंगन में किसी भाई-बहन का साथ नहीं मिलता तो वे बच्चे अपने स्कूल में भी अन्य बच्चों से अधिक मेलजोल नहीं बढ़ा पाते।

आगे चलकर अधिकांश ऐसे बच्चे अंतर्मुखी होकर समाज की मुख्यधारा से जुड़ने में असमर्थ हो जाते हैं, लेकिन ऐसी स्थिति में घर के नाना-नानी, दादा-दादी का सान्निध्य बच्चों को इस एकांत और संकोची मानस से विलग कर तरोताजा महसूस कराता है। माता-पिता का भी प्रयास होना चाहिए कि गाहे-बगाहे नजदीकी रिश्तेदार के बच्चों के साथ घुलने-मिलने का अवसर दिया जाए।

बुजुर्गों के प्यार से वंचित बच्चे अब छोटी-मोटी बीमारियों के लिए भी चिकित्सक के पास जाने को बाध्य हो गए हैं, जबकि पुराने जमाने में बच्चों की स्वास्थ्य की लघु समस्याएं दादी-नानी हल कर लिया करती थीं। नवजात शिशु को कैसे उठाएं, कैसे सुलाएं, कैसे मालिश करें, क्या पहनाएं और किस मौसम में कौन-सी प्राकृतिक जड़ी-बूटी का सेवन कराएं, ये सभी सिद्ध किए प्रयोग नानी-दादी के लिए अत्यंत उपयोगी हुआ करते थे।

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