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दुनिया मेरे आगे: भलाई करने से मिलती है आत्मिक सुख- शांति

अगर हम प्रत्येक दिन को नई शुरुआत के रूप में देखते हैं, तो हम अधिक खुश, अधिक ऊर्जावान और अधिक प्रेरित महसूस करेंगे।
Written by: जनसत्ता | Edited By: Bishwa Nath Jha
नई दिल्ली | Updated: December 30, 2023 11:53 IST
दुनिया मेरे आगे  भलाई करने से मिलती है आत्मिक सुख  शांति
प्रतीकात्‍मक तस्‍वीर। फोटो- (इंडियन एक्‍सप्रेस)।
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अलका ‘सोनी’

यह एक स्वयंसिद्ध सच्चाई है कि महत्त्वपूर्ण जीवन जीने का मतलब है जितना संभव हो, उतने महत्त्वपूर्ण क्षण को जीना है। मगर एक महत्त्वपूर्ण क्षण क्या है? हम हर दिन सुबह जागते हैं एक नए दिन के साथ, पूरी एक अंधेरी रात बिताने के बाद, लेकिन जागते ही हम लग जाते हैं अपने दैनिक कार्यों को निबटाने में। हमें इतनी भी फुर्सत नहीं होती कि दो पल रुक कर सोचें कि यह नया दिन क्यों मिला हमें!

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हमें वह नया दिन मिलता है बदलाव लाने और महत्त्वपूर्ण क्षण बनाने के लिए। कुछ नया और सकारात्मक करने के लिए। हां, अब इस नए की परिभाषा सबके लिए अलग-अलग हो सकती है, क्योंकि एक व्यक्ति के लिए जो बात महत्त्वपूर्ण है, वह दूसरे के लिए नहीं हो सकती है। या जो चीज किसी के लिए एक बार महत्त्वपूर्ण थी, वह वर्षों बाद उसी रूप में महत्त्वपूर्ण नहीं रह सकती है। क्षण, क्षणभंगुर और संक्षिप्त होता है। हम आमतौर पर उन्हें उस छोटी अवधि में महत्त्वपूर्ण नहीं मानते हैं। उसका महत्त्व उस क्षण के बीत जाने के बाद ही पता चलता है।

फिर भी, जो चीज एक क्षण को महत्त्वपूर्ण बनाती है, वह उसका व्यक्तिगत प्रभाव है, जिसे केवल किसी व्यक्ति की आत्मा के मूल में ही मापा जा सकता है। हम यह सोचते हैं कि जीवन का महत्त्व प्रसिद्धि, भाग्य, उपाधियों और उपलब्धियों से मापा जाना चाहिए। यानी जो जितना समृद्ध, वह उतना महत्त्वपूर्ण। यह तो हमारा ही बनाया हुआ मीटर है, जिससे हम बाकी सबको मापते रहते हैं। दरअसल, हमारा महत्त्व इस बात में नहीं है कि हम खुद को ऊपर उठाने के लिए क्या करते हैं, बल्कि इसमें है कि हम दूसरों को ऊपर उठाने में मदद के लिए क्या करते हैं। दूसरों को खुश होने के कितने क्षण दे पाते हैं!

अगर हम प्रत्येक दिन को नई शुरुआत के रूप में देखते हैं, तो हम अधिक खुश, अधिक ऊर्जावान और अधिक प्रेरित महसूस करेंगे। हमारे जीवन का हर दिन एक नई शुरुआत है, न कि साल का पहला दिन। अब जो आखिरी मुकाम पर पहुंचे वर्ष के आखिरी दिन हैं, वे भी। दैनिक जीवन की ये बहुत छोटी-छोटी बातें हैं, लेकिन यही हमें अपने आसपास के जीवन से जुड़ना सिखाती हैं। किसी की भलाई करने पर जो आत्मिक शांति और सुख मिलता है, उसके सामने उन ऐंद्रिक सुखों की कोई तुलना नहीं, जिसे आज दुनिया भूलते जा रही है।

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यहां ‘नए’ शब्द से किसी नए फैशन का अर्थ नहीं है, जिसे आनन- फानन में खरीदा और पहन लिया। यह एक आदत है, जिसे अपने अंदर विकसित करने की आवश्यकता होती है। अगर हम अपने घर के पास काम करने वाले मजदूरों को इस ठंड के मौसम में एक प्याला चाय दे सकते हैं या फिर सामने अमरूद के पेड़ पर फल खाने आई चिड़िया, जो डाल पर दुबक कर बैठी हुई है या अगर हम एक छोटा-सा कपड़ा उसकी टहनी पर रख सकते हैं, जिससे इन्हें छोटी-सी मदद मिल सकती है, या अगर हम यह करने की सोच रहे हैं तो यह दुनिया के लिए एक शुभ संकेत है। यह धीरे- धीरे हमारी आदत में शुमार होता चला जाएगा।

यह शुरू में कुछ अटपटा लग सकता है, लेकिन असंभव कतई नहीं है। बस कोशिश करने की जरूरत है। हमारे आसपास के पेड़ों पर कितनी चिड़ियां, गिलहरियां और तितलियां आती हैं, लेकिन जब वही पेड़ संकट में पड़ जाता है, यानी जब उसे काटा जाता है तो उन चिड़ियों, गिलहरियों या तितलियों का क्या होता है? कहां जाती हैं वे सब? ऐसे में अगर हम उस पेड़ को कटने से बचाने की छोटी-सी भी कोशिश करते हैं तो बस यही एक नई शुरुआत है।

हम सबके जीवन से एक वर्ष लगभग जा चुका है और नया वर्ष आ चला है। प्रकृति ने हमें एक और मौका दिया है। एक और सुअवसर दिया है कुछ करने का। यह इस बात को समझने का भी एक मौका है कि केवल सांसों को लेना और छोड़ना ही जीवन नहीं है। जीवन तो इन सांसों के बीच में ही कहीं है। बस उस क्षण को पकड़ने की जरूरत है, क्योंकि मनुष्य के रूप में हमें वह क्षमता मिली है जो किसी अन्य जीव में नहीं है। इन क्षमताओं का उपयोग हम अन्य मनुष्यों के और जीवन के अन्य रूपों की भलाई के लिए कर सके तो ही हमारा जीवन सार्थक माना जाएगा।

इस तरह का जीवन जीने के लिए सबसे पहले हमें अपने अंदर की कमजोरी से लड़ना होता है। किसी भी मनुष्य की वास्तविक प्रकृति का यही अनिवार्य हिस्सा है। यह वर्ष बीत चुका है। हम सबने एक लंबी रात बिता दी है। अब नया सवेरा सामने है, जिसका स्वागत पूरे दिल से करने की जरूरत है। दृढ़ संकल्प के साथ कि आने वाला वर्ष हम सबके लिए महत्त्वपूर्ण हो।

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