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दुनिया मेरे आगे: विपरीत परिस्थितियों में उपलब्धियों का सृजन करना सबसे अहम

आमतौर पर देखा गया है कि जो अटल इरादों के धनी होते हैं, उनके लिए अपने समूचे जीवन में ‘असंभव’ का कहीं कोई स्थान नहीं होता।
Written by: जनसत्ता | Edited By: Bishwa Nath Jha
Updated: November 24, 2023 09:45 IST
दुनिया मेरे आगे  विपरीत परिस्थितियों में उपलब्धियों का सृजन करना  सबसे अहम
प्रतीकात्‍मक तस्‍वीर। फोटो- (इंडियन एक्‍सप्रेस)।
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राजेंद्र बज

जीवन में उतार-चढ़ाव आते रहते हैं। उतार के दौर में कहीं फिसल न जाएं और चढ़ाव के दौर में कहीं डगमगा न जाएं, बस इतनी-सी बात ध्यान रखकर सम-विषम परिस्थितियों का मुकाबला किया जा सकता है। ऐसा नहीं है कि हमारे जीवन में परिस्थितियां ताउम्र एक समान रहें। ऐसा भी नहीं है कि हमारी मनोस्थिति अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थितियों में भी समता भाव लिए हो। दरअसल, व्यक्ति के जीवन में जो कुछ घटित होता है, वह कर्मजन्य तो होता ही है- लेकिन कभी-कभी परिस्थितिवश भी घटित हो जाता है। अब यह हमारे ऊपर निर्भर करता है कि हम जीवन के उतार-चढ़ाव के दौर में अपने आप को कितना संयत रख पाते हैं! ऐसा दौर वास्तव में हमारे संयम की परीक्षा लिया करता है।

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दरअसल, किसी भी शख्सियत के व्यक्तित्व और कृतित्व में निखार भी तभी आ पाता है, जब वह कड़े संघर्ष के दौर से गुजर कर समाज और राष्ट्र के लिए कुछ कर सके। अन्यथा जीने को तो सभी जीते हैं, लेकिन विपरीत परिस्थितियों से पार पाकर उपलब्धियों का सृजन करना अपने आप में सबसे अहम है। हालांकि प्रथम दृष्टया हम अपने और अपने परिवार के लिए जीते हैं। हम मन-वचन-कर्म की संपूर्ण एकाग्रता के साथ समाज में अपनी भूमिका का निर्धारण करते हुए जीवनयापन का कोई माध्यम अपनाते हैं। हम पूर्ण रूप से व्यक्तिगत जीवन जी कर भी सार्वजनिक तौर पर जन-जन को प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से कर्मठता के प्रति प्रेरित भी करते हैं।

जाहिर तौर पर हमारा जीना अपने और अपनों के लिए होता है, लेकिन किसी न किसी रूप में कोई न कोई हमारे आचरण और व्यवहार को अपने व्यावहारिक जीवन में भी उतारता है। एक प्रकार से हम कहीं न कहीं किसी अन्य के लिए प्रेरक का कार्य करते हैं, लेकिन हम नहीं जानते कि हमसे कौन-कौन और किस-किस प्रकार की प्रेरणा प्राप्त कर रहा है। सांसारिक जीवन में हर एक व्यक्ति किसी न किसी व्यक्ति विशेष के व्यक्तित्व और कृतित्व से गहरे रूप से प्रभावित होता है। समाज में अनेक चेहरे ऐसे होते हैं, जिनके मन-वचन-कर्म की एकाग्रता उनकी सफलता के कारक के रूप में जानी जाती है।

ऐसे व्यक्तित्व का अनुकरण करने की प्रक्रिया समाज में आम देखी जा सकती है। ऐसे में प्रत्येक व्यक्ति किसी न किसी रूप में किसी अन्य के लिए प्रेरक का कार्य कर रहा होता है। हालांकि हम नहीं जानते कि हमसे कौन कैसी प्रेरणा ले रहा है? ऐसे में हमें चाहिए कि हम जीवन में आने वाली तमाम चुनौतियों का साहसपूर्वक सामना करें। हम किसी और पर विश्वास कर पाएं या नहीं, लेकिन अपने आप पर अटूट विश्वास को कभी खंडित नहीं होने देना चाहिए। यों भी कहा गया है कि ‘मन के हारे हार है और मन के जीते जीत’। जिस शख्सियत ने इस परम सत्य को जान लिया और अपने व्यावहारिक जीवन में आत्मसात कर लिया, उसकी सफलता में कहीं कोई बाधा नहीं आ सकती।

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हमारे धर्म शास्त्रों में मन की शक्ति को महत्त्वपूर्ण स्थान दिया गया है। आमतौर पर देखा गया है कि जो अटल इरादों के धनी होते हैं, उनके लिए अपने समूचे जीवन में ‘असंभव’ का कहीं कोई स्थान नहीं होता। नजरें दौड़ाएं तो पाएंगे कि ऐसे अनेक चेहरे हमारे आसपास भी बहुतायत से मिल सकते हैं। बस, जिस पल हमारी दृष्टि में ऐसे किसी व्यक्तित्व का अक्स मानस पटल पर तैर जाए, समझ लेना चाहिए कि आदर्श गुरु की खोज पूरी हो गई। समय-समय पर अलग-अलग वर्ग के कर्मठ लोगों को अपना प्रेरक मानते हुए हम अपने जीवन में उत्तरोत्तर प्रगति पथ पर अग्रसर हो सकते हैं।

आमतौर पर बाल मन में विभिन्न महान लोगों के व्यक्तित्व और कृतित्व को स्थापित किया जाता है। हर कोई शीर्ष महान नहीं बन सकता, लेकिन जब करोड़ों में लाखों की तलाश हो, तब भी महान व्यक्ति तो हमें गढ़ने होंगे। ऐसे लोगों के पदचिह्नों पर चलने वाली शख्सियत को भी स्वीकार करने की आवश्यकता होगी। कल्पना करने की बात है कि लाखों-करोड़ों विद्यार्थियों में कितने आइएएस या आइपीएस बन सकेंगे, कितने आइआइटी निकाल सकेंगे।

ऐसे में यह आवश्यक हो जाता है कि हम अनुयायियों के भी अनुयायी बनें। हम अपने आसपास दृष्टिपात करें, तो ऐसे चेहरे हमें नजर आ सकते हैं। दरअसल, आवश्यकता इस बात की है कि हम लगभग प्रत्येक व्यक्ति के आचरण और व्यवहार में अंतर्निहित पराक्रम के भाव को समझने का प्रयास करें। निश्चित ही इस दिशा में कुछ करने के लिए हमें कोई अधिक मशक्कत भी नहीं करनी होगी। हां, प्रयासों में ईमानदारी का तकाजा हमेशा ही रहेगा। दृष्टि में वस्तुपरकता की आवश्यकता सबसे ऊपर रहेगी, क्योंकि तभी हम उस व्यक्ति की पहचान कर सकेंगे, जिनके पदचिह्नों पर हम चल सकें। किसी भी व्यक्ति का मूल्यांकन रहित अंधानुकरण हमेशा नकारात्मक और विपरीत नतीजे देने वाला होता है। इसलिए अनुकरण की अहमियत तभी उचित सिद्ध होती है, जब वह हमें मनुष्य के रूप में बेहतर बनाए।

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