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दुनिया मेरे आगे: संवाद का सलीका, आपकी बातें बताती हैं आप का व्यक्तित्व, बोलने में मीठापन जरूरी

बातों की महत्ता इससे साबित होती है कि वे सकारात्मक भाव से कही जा रही हैं या नकारात्मक भाव से। संवेदनशील और तथ्यपरक बातें रंजोगम से डूबे लोगों में भी सकारात्मकता की सुवास फैला देती हैं, जबकि नकारात्मक बातें खुशगवार माहौल में भी निराशा भर देती हैं। पढ़े संगीता सहाय के विचार।
Written by: जनसत्ता
नई दिल्ली | Updated: April 23, 2024 09:18 IST
दुनिया मेरे आगे  संवाद का सलीका  आपकी बातें बताती हैं आप का व्यक्तित्व  बोलने में मीठापन जरूरी
जीवन में अच्छे विचारों और बोलने की अच्छी शैली से व्यक्तित्व में मिठास आती है।
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किसी बच्चे के धरती पर आने के साथ ही उसकी बातों का सिलसिला शुरू हो जाता है। आरंभ में वह संकेतों और शारीरिक भाव-भंगिमाओं के माध्यम से अपनी बात कहता है या अपनी इच्छा-अनिच्छा से लोगों को अवगत कराता है। फिर जैसे-जैसे बड़ा होता जाता है, उसकी समझ और दिमाग में शब्दों के भंडार में बढ़ोतरी होती जाती है और साथ ही वह अपनी अभिव्यक्ति के लिए शब्दगुच्छ का प्रयोग करने लगता है। जैसे-जैसे उसकी समझ और ग्राहय क्षमता में स्पष्टता आती जाती है, उसकी अभिव्यक्ति और भाषा भी स्पष्ट होती जाती है। वास्तव में ‘बातें’ बस बात भर नहीं होतीं। हर बात के अपने मायने और महत्त्व होते हैं।

व्यक्ति सुबह से लेकर रात के सोने तक अपनी बातों को माध्यम बनाते हुए ही अपने लगभग सभी कामों को अंजाम देता है। संवाद के रूप अलग-अलग हो सकते हैं। कहा जा सकता है कि पूरी दुनिया के तमाम क्रिया-प्रक्रिया के संचालन में संवाद की भूमिका सबसे अहम है। बावजूद इसके लोग अक्सर ये कहते मिल जाते हैं कि ‘बातें हैं, बातों का क्या?’ एक समय था जब मौखिक बातों का महत्त्व लिखित बातों से ज्यादा होता था।

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लोग जुबान से निकली बात को पत्थर की लकीर मानते थे और उसे पूरा करने के लिए मर मिटते थे। किसी विषय को लेकर जुबान देने का मतलब था, किसी भी सूरत में उससे मुकरना नहीं। आज ऐसे लोगों की संख्या कम होती जा रही है। आधुनिकता के नाम पर हमारे चारों तरफ ‘कहना कुछ और करना कुछ’ जैसे फलसफे पर चलने वालों की संख्या बढ़ती जा रही है। जुबान देने और लेने जैसी बातें चलन से बाहर हो चुकी हैं। किसी भी हाल में ‘पहले अपना हित, बाद में कुछ और’ जैसी दलीलें इस दौर के स्याह सच बन चुके हैं। संवाद में संवेदनहीनता का घर बनता जा रहा है। एक बात में कई बातों का चस्पां होना भी आम हो चुका है। ऐसे में बातों की गरिमा का कम होना स्वाभाविक ही है।

जब ‘बात’ की बात निकली है, तो महत्त्वपूर्ण यह भी है कि कुछ बातें अपने अंदाजे-बयां, सलीका और शब्दों की जादूगरी से खास बन जाती हैं और लोगों की जेहन में अमिट भी। जबकि कुछ महज होठों से फिसलकर हवाओं में गुम हो जाती हैं। एक मंचीय कवि और शायर अपनी लयबद्ध बातों से अपने श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर देता है। किसी व्यक्ति को उत्कृष्ट नेतृत्वकर्ता बनाने में उसकी वाकपटुता और बेहतर शब्द सामंजस्य महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। अपनी कुशल वक्तृत्व क्षमता की बदौलत वह सहजता से हजारों या लाखों लोगों तक अपनी बात पहुंचा देता है, जबकि एक अकुशल वक्ता को इसके लिए ज्यादा मशक्कत करनी पड़ती है।

किसी बात को बोलने से भी बड़ी बात है, हम क्या, क्यों, कहां और कैसे बोल रहे हैं। हमारे ग्रामीण समाज में एक कहावत प्रचलित है- ‘मीठी बातें पान खिलावे, कड़वी बातें जूता’, यानी अच्छी बात करने वाला सभी का मान-सम्मान हासिल करता है, जबकि अनावश्यक रूप से तिक्त बात करने वाला अपने तमाम गुणों के बावजूद समाज में समुचित सम्मान नहीं प्राप्त कर पाता।

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प्रेमचंद की प्रसिद्ध रचना ‘बड़े घर की बेटी’ में नायिका आनंदी अपनी समझदारी भरी बातों से अपने परिवार को बिखरने से बचा लेती है, हालांकि एक बोली की वजह से परिवार बिखरने पर उतारू हो जाता है। हमारे आसपास भी ऐसे अनगिनत उदाहरण मिल जाते हैं। बात व्यक्तिगत संबंधों की करें या राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय संबंधों की, हर जगह बातों की जादूगरी का बोलबाला है। हमारे प्राचीन ग्रंथों में बारंबार बातों की महिमा को दर्शाया गया है। इसने बड़े से बड़े युद्ध को रोका है तो बड़ा से बड़ा युद्ध करवाया भी है।

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बातों की महत्ता इससे साबित होती है कि वे सकारात्मक भाव से कही जा रही हैं या नकारात्मक भाव से। संवेदनशील और तथ्यपरक बातें रंजोगम से डूबे लोगों में भी सकारात्मकता की सुवास फैला देती हैं, जबकि नकारात्मक बातें खुशगवार माहौल में भी निराशा भर देती हैं। बातें किसी के दिल से निकली हों, वे राग या विराग होती हैं। इसका असर बोलने और सुनने वाले दोनों पर होता है। कुछ स्वयं गमजदा होकर भी दूसरों के गम को अपने स्नेहिल शब्दों से हर लेते हैं। जबकि कुछ खुशी के वातावरण को भी बोझिल बना देते हैं। कबीर कहते हैं, ‘ऐसी वाणी बोलिए मन का आपा खोए, औरन को शीतल करे, आपहूं शीतल होए।’

किसी व्यक्ति की सफलता इन्हीं राहों से होकर गुजरती हैं। व्यक्ति की बातें उसके व्यक्तित्व का आईना होती हैं। पहले धैर्य के साथ सुनना, समझना, मनन करना, फिर बोलना, यह कला जिस व्यक्ति में होती है, वह जीवन की हर बाजी को जीतने की क्षमता रखता है। कोई नौकरीपेशा हो, व्यापारी हो, कलाकार हो या अन्य कार्य करता हो, सभी की सफलता और स्थायित्व के लिए वाकपटुता आवश्यक है।

बातों के संदर्भ में एक आवश्यक बात यह भी है कि व्यक्ति की कथनी और करनी में सामंजस्य आवश्यक है। ‘कहना कुछ, करना कुछ’ जैसी चीजें पूरे समाज को चोटिल करती हैं। आजीवन वास्तविक साधुत्व को जीते राष्ट्रपिता गांधी के विवेकपूर्ण और ओजस्वी वक्तृत्व क्षमता के आगे शक्तिशाली फिरंगी और तमाम लोग नतमस्तक हो जाते थे, क्योंकि उनके पारदर्शी व्यक्तित्व में कोई दोहरापन नहीं था। जो कहना, वही करना और वैसा ही आचरण करना बापू के जीने का तरीका था। हर दौर में ‘बात’ का औचित्य भी इसी में है।

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