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दुनिया मेरे आगे: सपनों का बोझ, महत्त्वाकांक्षा का होना अहम है, लेकिन उसे संतुलित बनाए रखना भी आवश्यक

युवा वर्ग के बढ़ते अवसाद का मुख्य कारण व्यापक रूप से विभिन्न प्रकार के प्रतिस्पर्धात्मक दबाव हैं। इसमें पाठ्यक्रम का भार, परिवार और समाज से आशा की भारी अपेक्षाएं और सामाजिक मानकों के लिए अधिकारिक दबाव शामिल होते हैं। पढ़ें मुनीष भाटिया का विचार।
Written by: जनसत्ता
नई दिल्ली | Updated: June 06, 2024 06:39 IST
दुनिया मेरे आगे  सपनों का बोझ  महत्त्वाकांक्षा का होना अहम है  लेकिन उसे संतुलित बनाए रखना भी आवश्यक
प्रतीकात्मक तस्वीर। फोटो -(इंडियन एक्सप्रेस)।
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वर्तमान का महत्त्व समझना और उसे सही ढंग से जीना हमारे भविष्य को सुनहरा बनाने का मार्ग प्रशस्त करता है। ईमानदारी से सर्वोत्तम देने की कोशिश हमें अपने लक्ष्यों की दिशा में साहस और प्रेरणा प्रदान करती है। सपनों को अपना मार्गदर्शक बनाने के लिए उन्हें जीवन जीने का प्रेरणा स्रोत बनाना चाहिए, न कि तनाव का कारण। सपनों का सही तरीके से अपनी क्षमता के अनुसार पूरा करने का प्रयास करना हमें उत्साह, उम्मीद और सकारात्मकता की ओर ले जाता है। महत्त्वाकांक्षा का होना अहम है, लेकिन उसे संतुलित बनाए रखना भी आवश्यक है। हमें अपनी महत्त्वाकांक्षाओं को वास्तविकता के साथ मेल बना कर रखना और उन्हें पूरा करने के लिए उचित कदम उठाने की कोशिश करनी चाहिए। जीवन में स्वप्न देखना जरूरी है और यही जरूरत महत्त्वाकांक्षा को जन्म देती है। इसलिए सपनों को पूरा करने की खातिर सार्थक प्रयास की दिशा में परिवार और समाज को प्रेरित करना चाहिए, ताकि निराशा का फिर जिंदगी में स्थान न रहे।

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इच्छाएं पूरी नहीं हो पाने पर बढ़ रही है निराशा

आजकल मनुष्य अपने सपनों और महत्त्वाकांक्षा के वशीभूत होकर अपने आसपास के लोगों को निवेश के रूप में देख रहा है। अपनी उम्मीदों को पूरा करने के लिए दूसरे के सपनों को पूरा कर पाने की क्षमता को भूल जाता है। वर्तमान प्रतिस्पर्धात्मक युग में युवा वर्ग में बढ़ रहे अवसाद की प्रवृत्ति समाज के लिए चिंता का विषय बनी हुई है, जिसके लिए जिम्मेदार समाज की इस शक्ति के प्रति बुने गए विशाल सपनों का मायाजाल ही है। कहीं पाठ्यक्रम का मानसिक दबाव, तो कहीं प्रतियोगी परीक्षा में बार-बार मेहनत करने के बावजूद मनोवांछित सफलता न प्राप्त करना और सपनों के पूरा न होने के फलस्वरूप हताशा को जन्म दे रहा है।

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दबाव से टूट रहे परिवार की आशाएं और उम्मीदें

युवा वर्ग के बढ़ते अवसाद का मुख्य कारण व्यापक रूप से विभिन्न प्रकार के प्रतिस्पर्धात्मक दबाव हैं। इसमें पाठ्यक्रम का भार, परिवार और समाज से आशा की भारी अपेक्षाएं और सामाजिक मानकों के लिए अधिकारिक दबाव शामिल होते हैं। पाठ्यक्रम के भार के साथ विद्यार्थियों को निरंतर समाज और परिवार के सपनों के दबाव का सामना करना पड़ता है, जिससे उनका मानसिक स्वास्थ्य प्रभावित होता है। दूसरों की महत्त्वाकांक्षाओं को पूरा न कर पाने की स्थिति में और बार-बार विफलता के दौरान युवा वर्ग को अवसाद का सामना करना पड़ता है।

यह विफलता उनके स्वाभाविक संघर्ष को नकारात्मक रूप से प्रभावित करती है और उन्हें निराशा में डाल सकती है। अभिभावक वर्ग जो अनावश्यक अपेक्षाएं अपने बच्चों से करने लगते हैं, वह किशोर मन पर मानसिक दबाव डालने का काम करता है। जब वह युवा इन अपेक्षाओं के समक्ष खुद को कमतर पाता है, तो वह अंदर ही अंदर घुटन महसूस करने लगता है। यह बात तो सच है कि बच्चे में जितनी क्षमता होगी, वह उतना ही श्रेष्ठ दे पाता है। फिर भी अभिभावक वर्ग अनावश्यक अपेक्षाओं के कारण अपनी संतान के मन को कुंठित कर रहे हैं।

आत्महत्या करने वाले के मनोभाव को न पढ़ पाने के कारण ही आत्महत्या के मामलों में भी उत्तरोत्तर बढ़ोतरी हो रही है। इसलिए यह परिवार की जिम्मेदारी हो जाती है कि अनावश्यक अपेक्षाएं अपनी संतान के प्रति न रखें और उसे पढ़ने के लिए उसकी रुचि के अनुसार ही विषय चयन करने में सहयोग दें, क्योंकि कई बार अभिभावक अपनी संतान की रुचि के विपरीत संकाय में अपने बच्चों का जबरन प्रवेश करवा देते हैं, जहां न तो उसका मन लगता है और न ही वह अपनी क्षमता के अनुसार अपना सर्वश्रेष्ठ दे पाता है।

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नतीजतन, बुझे मन से की गई पढ़ाई और परीक्षा में वह पिछड़ने लगता है, जो अवसाद का कारण बनता है। माता-पिता को अपने बच्चों की रुचि और प्राथमिकताओं को समझना महत्त्वपूर्ण है। बिना उनकी रुचि को ध्यान में रखे, सपनों का बोझ डालना उन्हें मानसिक दबाव में डाल सकता है। कभी-कभी मानसिक दबाव के चलते बच्चे अपने माता-पिता के सपनों को पूरा नहीं कर पाते हैं और गलत कदम उठा लेते हैं। इसलिए संवेदनशीलता और सहानुभूति से एक-दूसरे को समझने की आवश्यकता होती है।

मनुष्य की उम्मीदें अक्सर असीमित होती हैं और वह अपने प्रयासों से अधिक करने की क्षमता रखता है। यही उम्मीद उसे अपने सपनों की ऊंचाई तक पहुंचने की शक्ति प्रदान करती है। सपनों की ऊंचाई तो आकाश से भी ऊंची होती है। कई बार लोग आसानी से अपनी उम्मीदें दूसरों के ऊपर रखते हैं, जिससे अधिकांश दुख और विफलता का कारण बनता है। सपनों को पूरा करने के लिए विश्वास और मेहनत दोनों ही जरूरी होते हैं। सपनों को अपने लक्ष्य के रूप में देखना और उनको पूरा करने के लिए प्रतिबद्ध रहना हमें सफलता की ऊंचाइयों तक पहुंचा सकता है।

सपनों को मनोबल के रूप में और दिशा देने का शस्त्र बनाना चाहिए, न कि बोझ। सपनों को पूरा करने के लिए मेहनत करनी चाहिए, लेकिन उन्हें जिंदगी का बोझ नहीं बनने देना चाहिए। वे हमें प्रेरित करते हैं, हमें लक्ष्य की दिशा देते हैं और हमें सफलता की ओर आगे बढ़ने की शक्ति प्रदान करते हैं। वर्तमान की समीक्षा करके भविष्य की दिशा में कदम बढ़ाने के लिए काम करना चाहिए, पर इसके चक्कर में हमें वर्तमान को नुकसान पहुंचाने से बचना चाहिए। अच्छे भविष्य का निर्माण, वर्तमान के संरक्षण और उज्जवल भविष्य के लिए सपनों को ईमानदारी से जिंदगी का सर्वश्रेष्ठ देने में ही निहित है।

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