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दुनिया मेरे आगे: दुख, दर्द, खुशी, अकेलेपन के सफर की साथी किताबें, व्यक्तित्व निर्माण के साथ सिखाती हैं जीने की कला

किताबें न सिर्फ हमारा व्यक्तित्व गढ़ती, बल्कि हमें मानसिक समस्याओं से भी बचाती हैं। पढ़ने से दिमाग का अच्छा व्यायाम होता है। पढ़ने के दौरान हमारे अंदर एकाग्रता में बढ़ोतरी होती है, जिससे हम किसी भी परिस्थिति में अपने लक्ष्य को प्राप्त करना सीखते हैं। पढ़ें दीपिका शर्मा के विचार।
Written by: जनसत्ता
नई दिल्ली | Updated: April 03, 2024 09:07 IST
दुनिया मेरे आगे  दुख  दर्द  खुशी  अकेलेपन के सफर की साथी किताबें  व्यक्तित्व निर्माण के साथ सिखाती हैं जीने की कला
छपी हुई किताबों को साझा कर हम सामाजिक और पारिवारिक संबंधों को मजबूत बना सकते हैं। (Photo by Silent Book Club)
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जब कभी हम एक अच्छी पुस्तक पढ़ते हैं तो यह नए विचारों, संभावनाओं और संस्कृतियों का ज्ञान अर्जित करने का मार्ग खोल देती है।’ यह उक्ति वेरा नजारियान की है। बचपन से हम सुनते आ रहे हैं कि किताबें हमारी सबसे अच्छी दोस्त होती हैं जो जीवन भर हमें एक शिक्षक की तरह सिखाती हैं। मां की तरह हर मुसीबत में हमारा साथ निभाती हैं और पिता के भांति अंगुली थामे हर परिस्थिति में सही राह दिखाने का जिम्मा उठाती हैं।
दरअसल, इनसे प्राप्त ज्ञान ही है जो हमारे व्यक्तित्व का निर्माण कर हमें जीवन जीने की कला सिखाता है। कई बार बीच भंवर में ही कई रिश्ते हमें डूबता हुआ छोड़ जाते हैं, लेकिन किताबों से जुड़ा रिश्ता ही है, जो हमें कठिन दौर में सही रास्ता दिखा कर नाव पार लगाता है। किताबें हमारे दुख, दर्द, खुशी, अकेलेपन की साथी होती हैं। यही नहीं, ये एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में ज्ञान हस्तांतरित करने में एक अहम भूमिका निभाती हैं।

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यह एक ऐसा माध्यम है, जिसके जरिए हम महान हस्तियों के बारे में आसानी से जान पाते हैं, जिन्हें हम अपना आदर्श मानते हैं। कभी-कभी जीवन इतना नीरस हो जाता है कि हमें समझ ही नहीं आता कि हमें करना क्या है। ऐसे में हम उन लोगों से चिर-परिचित होकर उनके पदचिह्नों पर चलने की प्रेरणा इन किताबों से ही हासिल करते हैं। किताबें न सिर्फ हमारा व्यक्तित्व गढ़ती, बल्कि हमें मानसिक समस्याओं से भी बचाती हैं। पढ़ने से दिमाग का अच्छा व्यायाम होता है।

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पढ़ने के दौरान हमारे अंदर एकाग्रता में बढ़ोतरी होती है, जिससे हम किसी भी परिस्थिति में अपने लक्ष्य को प्राप्त करना सीखते हैं। ये हमारे मस्तिष्क को सक्रिय रखती हैं। अगर हम अपने मस्तिष्क को सक्रिय रखते हैं तो कुछ हद तक याददाश्त की कमजोरी या अवसाद से बचाने के लिए यह एक इलाज के तौर पर कारगर साबित होता है। इसके अलावा, अगर अच्छी किताबें पढ़ने के साथ-साथ हम अपने भीतर लेखन की आदत को अपना लेते हैं तो यह और बेहतर नतीजे देती है।

आजकल तो चिकित्सक भी किसी बड़ी बीमारी का इलाज करते समय लिखने और पढ़ने की सलाह को इलाज के एक तरीके के तौर पर प्रयोग करते हैं, क्योंकि अक्सर कई दवाइयों का दुष्परिणाम होता है कि वे तंत्रिका तंत्र पर असर डालती हैं। इससे याददाश्त कमजोर होने का भय रहता है। ऐसे में मरीज को लिखने और पढ़ने की सलाह दी जाती है, जिससे दिमाग सक्रिय रूप से काम कर सके।

आज बदलते जमाने के साथ हमारे इस दोस्त यानी किताबों का रंग-ढंग कुछ बदला-बदला रहने लगा है। जहां पहले किताबों को पढ़ते-पढ़ते उसकी सोंधी-सी महक भी हमारे मन पर छाप छोड़ा करती थी, आज किताबें डिजिटल होकर एक छोटे यंत्र में हमारी जेब में ही समा जाती हैं। हालांकि अगर कोई शारीरिक रूप से असमर्थ हो तो उनके लिए यह वरदान से कम नहीं, क्योंकि वे एक जगह बैठे हुए पढ़ और सुन भी सकते हैं। साथ ही ये पर्यावरण के अनुकूल भी हैं, क्योंकि इन्हें प्रकाशित करने के लिए सैकड़ों वृक्षों को काटने की आवश्यकता नहीं होती।

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छपी हुई किताबों को साझा कर हम सामाजिक और पारिवारिक संबंधों को मजबूत बना सकते हैं। किताबें इस बात का भी सबूत हैं कि एक दूसरे से किताबें साझा करते समय कितने ही प्रेमी जोड़ों ने अपने दिल का पैगाम इन किताबों के जरिए साझा किया। आज सोशल मीडिया के अलग-अलग मंचों की मदद से कुछ लोग अपने दिल की बात महज एक क्लिक के जरिए बोल देते हैं। यह दूसरी बात है कि आभासी दुनिया में सच्चे दिलों में सिर्फ दस फीसद लोग ऐसे होते हैं, जिन्हें सच्चा प्यार मिल पाता है।

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यह भी देखा जाता है कि इन मंचों पर जो जितनी जल्दी पा लेता है, वह उतना ही जल्दी खो भी देता है। जब किताबों वाला इश्क हुआ करता था, तब बड़ी मशक्कत के बाद प्रेमी युगल अपने दिल की बात अपने साथी तक पहुंचा पाते थे। इस तरीके में एक डर होता था कि किताब महबूब या महबूबा के हाथों में पड़ेगी भी या नहीं और पढ़ने के बाद इस पर प्रतिक्रिया क्या होगी!

कभी किताब में गुलाब रखना तो कभी मोर पंख। ऐसे कितने ही भाव हमारी किताबों से जुड़े हैं। उम्र के अंतिम पड़ाव पर भी अगर हम अपनी किताबों को सीने से लगाते हैं तो न जाने कितनी ही कही-अनकही बातों की यादें ताजा हो जाती हैं। हर उम्र में किताबों के मायने बदलते जाते हैं। बाल्यावस्था में बच्चा पढ़ना शुरू करता है तो रंग-बिरंगे चित्र उसे अपनी नई दुनिया लगने लगती हैं। किशोरावस्था तक पहुंचते-पहुंचते ज्ञान के भंडार की खोज करने लगता है।

तब पाठ्यपुस्तक के साथ-साथ सहायक किताबें उसे अच्छे नंबर दिलाने का काम करती हैं। युवावस्था तक आते-आते ज्ञान का भंडार व्यक्तित्व का निर्माण करने लगता है। प्रौढ़ावस्था तक आते-आते किताबें दिल-दुनिया की तस्वीर बन जाती हैं। वहीं वृद्धावस्था में किताबों के जरिए मोक्ष का द्वारा ढूंढ़ा जाता है। दरअसल, किताबें शुरू से लेकर अंत तक हर रोज पग-पग चलना सिखाती हैं।

सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक और साहित्यिक जैसे तमाम क्षेत्रों का ज्ञान हमें किताबों से ही मिलता है। मगर आज बाजारवाद के कारण किताबों में अश्लीलता ने पांव पसारे हैं। जिस कारण युवा पीढ़ी लक्ष्य से विचलित हो रही है। अच्छी किताबों से दिनोंदिन बढ़ती दूरी हमें नैतिक पतन, भौतिकवाद और आत्ममुग्ध आधुनिकता से ग्रस्त कर रही है। इसलिए जरूरी है कि हर बच्चे के अंदर नियमित और खुद ही पढ़ने-सीखने की जिज्ञासा उत्पन्न हो। पढ़ते-सीखते हुए अपने तय जीवन-लक्ष्यों की ओर आगे बढ़ा जाए।

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