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दुनिया मेरे आगे: किताब सिखाती है जीवन जीने की कला

दिमाग में उमड़ते-घुमड़ते विचारों को, मन के भावों को शब्दों में बांध कर पृष्ठ पर उतार देना कोई जादू या छूमंतर जैसा खेल नहीं है कि किसी ने छू भर दिया और सब हो गया। लेखन श्रम और लगन मांगता है। ध्यान और समय मांगता है। सरोकार वास्तविक नहीं हो तो लिखना बेमानी हो जाता है।
Written by: जनसत्ता | Edited By: Bishwa Nath Jha
नई दिल्ली | Updated: April 26, 2024 09:52 IST
दुनिया मेरे आगे  किताब सिखाती है जीवन जीने की कला
प्रतीकात्मक तस्वीर। फोटो -(इंडियन एक्सप्रेस)।
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सुरेश कुमार मिश्र ‘उरतृप्त’

किताबों की शीशे वाली अलमारी दिखने में बहुत सुंदर लगती है। ठीक उसी तरह, जिस तरह कोई रंग-बिरंगी पंछी पिंजरे के भीतर हो। किताबें और पंछी को बाहर की दुनिया में लाकर देखा जाए तो दोनों हमारी संकीर्णताओं को अपने-अपने ढंग से मिटाने की क्षमता रखती हैं। एक ज्ञान तो दूसरा स्वच्छंदता का प्रतीक है। दोनों जब तक कैद हैं, तब तक हम चाहकर भी अपनी संकीर्णताओं से मुक्त नहीं हो सकते हैं।

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किताबों की दुनिया बहुत विस्तृत और गहन है। इनके द्वारा हमें ज्ञान, अनुभव और जीवन के विभिन्न पहलुओं के बारे में सीखने का अवसर मिलता है। इनकी सहायता से हम प्राचीन धर्म, विज्ञान, तकनीक, इतिहास, सामाजिक विज्ञान, कला, साहित्य आदि के बारे में जान सकते हैं। इनका संसार बड़ा रोचक, मोहक और ज्ञानवर्धक है।

जिंदगी ‘पट्टी पूजन’ से शुरू होती है और पूरी जीवन यात्रा में किताबें हमारा पाथेय बनी रहती हैं। किताबें ज्ञान का कोश हैं और अनुभवजनित ज्ञान का भंडार हैं। यह जहां-तहां दुकानों, पुस्तकालयों, किताब मेलों आदि में सजती हैं। कुछ स्थानों पर लोकार्पित और विमोचित होती हैं, लेखकों से संवाद होता है। किताबें देखी जाने के साथ साथ खरीदी जाकर पुस्तकालयों और किताब प्रेमियों के घरों में विराजती हैं। कुछ यदा-कदा बांच ली जाती हैं, कुछ के पन्ने पलट लिए जाते हैं।

कुछ की अनुक्रमणिका देखकर ही किताब का जायजा ले लिया जाता है। कुछ जरूरत पड़ने पर संदर्भ के लिए संभाल कर रख दी जाती हैं और कुछ को सजा कर रख दिया जाता है। व्यक्तिगत पुस्तकालयों में कुछ पुस्तकों का भाग्य इतना बुलंद होता है कि उन्हें कई बार अक्षर-अक्षर इस तरह पढ़ लिया जाता है कि पूरी किताब पृष्ठ संख्या और अनुच्छेद के संदर्भ के साथ दिमाग में अंकित हो जाती है और कुछ अलमारियों में ऐसी कैद कर दी जाती हैं कि उनके अक्षरों को दीमक ही चाट जाती हैं।

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किताब प्रेमी भी कई तरह के होते हैं। उनमें विद्यार्थी हैं। ये लोग आमतौर पर अध्ययन और पढ़ाई में रुचि रखते हैं और किताबों के माध्यम से अपने ज्ञान और सूक्ष्म विचारधारा को बढ़ाना पसंद करते हैं। दूसरे होते हैं साहित्य प्रेमी। ये लोग साहित्यिक उत्पादों के प्रेमी होते हैं जैसे कि कहानियां, कविताएं, नाटक आदि। वे अपने बुद्धि, समझ और भावुकता के अंतर्गत साहित्य को समझते हैं और उससे प्रभावित होते हैं। तीसरे होते हैं इतिहास प्रेमी।

ये लोग इतिहास और संस्कृति से जुड़ी किताबों के प्रेमी होते हैं। वे किताबों का अध्ययन करते हैं और उनके माध्यम से अपनी जानकारी को बढ़ाते हैं। चौथे होते हैं विज्ञान प्रेमी, जो वैज्ञानिक उत्पादों, अनुसंधान और नवीनतम विकासों से जुड़ी किताबों के प्रेमी होते हैं। वे उन्हें पढ़ते हैं और उनसे नए विचारों का निर्माण करते हैं। धर्म प्रेमी लोग धर्म से संबंधित किताबों का अध्ययन करने में रुचि रखते हैं।

इस तरह किताब प्रेमियों के वर्ग अनंत हैं। मगर कुछ वर्ग ऐसे होते हैं जिनमें एक को खरीदने का और अलमारी में सजाने का खूब शौक होता है। कुछ तो बैठक में ही उन्हें सजा देते हैं और कमरे की शोभा बना देते हैं कि मेल-मिलापियों पर उनका अच्छा असर पड़े कि अमुक बेहद पढ़ाकू है। कुछ लोग पुस्तकों के इतने प्रेमी होते हैं जो किताबों का अक्षर-अक्षर जब तक नहीं पढ़ लेते हैं, तब तक बेचैन रहते हैं।

कुछ पढ़ कर समझने और उनका जीवन में प्रयोग करने के पक्षधर हैं तो कुछ दूसरों को बांच-बांच कर सुनाते रहते हैं। इसी तरह कुछ लोग किताबों से रट कर परीक्षा में लिख आते हैं, परीक्षा पास कर लेते हैं और बाद में सब भुला दिया जाता है। कुछ पाठक हैं तो कुछ पाठकों की सुविधा, रुचि और अपने अनुभवों का पिटारा सब तक पहुंचाने के लिए लगातार खुद को लिख-लिख कर अभिव्यक्त करते रहते हैं।

दरअसल, किताबें हमें जीवन जीने का मार्ग दिखाती हैं, हमारी मित्र हैं, सही गलत का बोध कराती हैं, अद्यतन सूचना से लैस करती हैं। ये लेखक के संचित अनुभवों का भंडार हैं। ये केवल शब्दों की बाजीगरी या जादूगरी नहीं हैं, बल्कि कितना-कितना सोचा समझा जाता है, तब जाकर शब्द वाक्य में, वाक्य अनुच्छेद में, अनुच्छेद पृष्ठों में, पृष्ठ अध्यायों में बदल कर किताब रूप में सजते हैं।

दिमाग में उमड़ते-घुमड़ते विचारों को, मन के भावों को शब्दों में बांध कर पृष्ठ पर उतार देना कोई जादू या छूमंतर जैसा खेल नहीं है कि किसी ने छू भर दिया और सब हो गया। लेखन श्रम और लगन मांगता है। ध्यान और समय मांगता है। सरोकार वास्तविक नहीं हो तो लिखना बेमानी हो जाता है। लिखा केवल इसीलिए नहीं जाता कि लेखक पर किसी तरह की भूख हावी होती है, बल्कि लिखा इसलिए भी लिखा जाता है लिखे बिना रह ही नहीं पाता।

समय बदला तो किताबें भी डिजिटल हो गई। अब वह पीडीएफ के रूप में मोबाइल में समा गई हैं। अब तो पढ़ने की भी आवश्यकता नहीं है। मोबाइल ही पढ़ देते हैं। रूप आकार बदलने से कुछ नहीं होता है। अंतिम उद्देश्य यही होना चाहिए कि किताब की संस्कृति बची और बनी रहनी चाहिए। लगते रहें किताबों के मेले। खरीदी और बांची जाती रहें किताबें।

मेले में लोकार्पित और विमोचित होती रहें किताबें। दुकानें ऐसे ही सजती रहें और किताब प्रेमी इन मेलों का आनंद लेते रहें। किताबें हम ‘सबकी सांची मीत’ हैं, पर यह याद रखना भी बेहद जरूरी है कि किताब स्थित विद्या और परहस्तगते धन किसी काम का नहीं होता। इसलिए किताबों का ज्ञान हमारे संज्ञान का विषय बना रहे। हम उन्हें पढ़ते-गुनते रहें, तभी किताबें ‘सांची मीत’ बनी रह सकती हैं।

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