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दुनिया मेरे आगे: अपनी कमी के लिए दूसरे को क्यों दें दोष, कामयाबी का श्रेय लें तो नाकामी को भी स्वीकारें

व्यक्ति अपने विकार दूर नहीं करना चाहता है, पर खुश रहने की चाह पाले रहता है। अगर हमारी आदतों में अहंकार, पाखंड, संकीर्णता, विचलन आदि है तो हमें कमजोर करने के लिए किसी दुश्मन की जरूरत नहीं, बल्कि हम खुद जिम्मेदार हैं।
Written by: सीमा श्रोत्रिय
नई दिल्ली | Updated: March 12, 2024 09:23 IST
दुनिया मेरे आगे  अपनी कमी के लिए दूसरे को क्यों दें दोष  कामयाबी का श्रेय लें तो नाकामी को भी स्वीकारें
अगर मृत्यु न हो तो जीवन भार बन जाएगा, यह संसार कांटों की तरह चुभने लगेगा। व्यक्ति में जीने की जो चाह है, वह मृत्यु के अप्रत्यक्ष कारण से ही है।
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नियति ने सृष्टि के समस्त जीवों को अपनी सर्वश्रेष्ठ जादूगरी से अत्यंत सुंदर, मनोहर और उपयोगी बनाया है। जीव विभिन्न लोकों में तरह-तरह से भ्रमण करता है। संसार के बहुत से रहस्य ऋषि, मुनियों, तपस्वियों और साधकों के तपोबल से बाहर हैं। परंपरागत रूप से अनेक शोध, मनन और अध्ययन इस जाल को तोड़ नहीं पाए। नैसर्गिक रूप से निरे तर्क ईश्वर की रचना पर चाहकर भी खरे नहीं उतरते। जीव जितना उनके रहस्यों को समझने की कोशिश करता है, वे उतने ही अधिक गहराते जाते हैं। बहुधा मानवीय समझ सुलझने की बजाय उलझती जाती है।

बहुत कम लोग जानते हैं जीवन सही जीने की कला

मनुष्य पैदाइशी रूप से आनंद और सुख तलाशता है, पर व्यावहारिक तौर पर वैसा काम नहीं करता है तो दुख पैर पसार जाता है। जीवन सही जीने की कला बहुत कम लोग जानते हैं। व्यक्ति जब-जब कुछ करने की सोचता है तो काम, क्रोध, मद, मोह और लोभ की आभा निरंतर उसे अपने आगोश में ले लेती है। अगर वह उन पर नियंत्रण का बारंबार अभ्यास नहीं करता है तो वही चीजें समाज में उसे नीचा दिखाने का काम करती हैं। किंकर्तव्यविमूढ़ता में व्यक्ति यह मानने में विफल होता है कि ऐसे विकारों से कितनी गिरावट का सामना उसे करना पड़ा। गिरना सरल है और एक बार गिरने पर व्यक्ति बार-बार और भी ज्यादा गिरता जाता है, जबकि अगर कहीं गिर जाए तो उठकर संभलना और संभलकर चलना बहुत कम लोगों के नसीब में होता है।

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सही मूल्यांकन से विकारों से बच जाता है इंसान

अज्ञानता में मनुष्य ऐसा समझते हैं जैसे वे लाखों वर्षों के लिए आए हैं और कभी नहीं जाएंगे। वे भ्रम में जीते हैं। संसार में जो भी पैदा हुआ है, उसे देर-सबेर नष्ट होना है। झूठी शान-शौकत के चक्कर में वह अपने अस्तित्व को सही पहचानने में नाकाम दिखता है। अगर हमें ठीक से जीना है तो अपने बाह्य और आंतरिक रूप को पहचानने, समझने और उसके नवनिर्माण की बीड़ा गंभीरता से उठाना चाहिए। जिसने अपना सही मूल्यांकन करना सीख लिया, वह बहुत-सी समस्याओं और विकारों से बच भी जाता है। यह तभी संभव है, जब व्यक्ति अहंकारी हवा से नहीं फूलता है, अपनी कमी निरपेक्ष भाव से देखता है, किसी भी परिस्थिति में हुए सही या गलत कर्म की जिम्मेदारी खुद के कंधों पर लेता है। ज्यादा दिक्कत पाखंडी केंचुली से होती है। संयोगवश जब यह उतरती है तो व्यक्ति खुद को हल्का महसूस करता है।

अमूमन व्यक्ति छोटी-बड़ी सफलता का श्रेय खुद को देता है और विफलता का ठीकरा दूसरों के माथे पर फोड़ता है। थोड़े से कर्म से ज्यादा पाने की लालसा उसे बुरी तरह जकड़ लेती है। भाग्य से मिली सफलता में वह खुद को खिलाड़ी मानता है और इठलाता है। याद रखना चाहिए कि जो भाग्य हमें उठाता है, वही जब पटकनी देता है तो तब हम खुद के कर्म को दोषी ठहराने में नितांत कंजूसी करते हैं। दूसरों की अपेक्षा विकास का मुकाम ज्यादा हासिल होने से इंसान फूला नहीं समाता और खुद को कुशल, सक्षम व कर्मसाधना का मालिक मान बैठता है।

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इंसानी जीवन में स्वार्थ का बहुत महत्त्व है। स्वार्थ जब हित के साथ जुड़ा रहेगा, तब वह ज्यादा विकृत नहीं होता। संसार में दूसरे से काम पड़ना जुड़ाव का बहुत बड़ा साधन है। दिक्कत तब आती है जब खुद के स्वार्थराग को आगे रख दूसरों के साथ आचरण करते हैं। कोई भी आमतौर तब तक सहयोग करता है, जब तक आप उसकी नजरों में स्वार्थी नहीं होते। विकास की तथाकथित चूहादौड़ में समाज का जिस तेजी से नैतिक पतन हो रहा है, वह हमें उतना ही स्वार्थ जंजाल में जकड़ रहा है।

चतुराई, धोखा, गुमराह करने की आदत, गैर-जिम्मेदारी से कुछ भी बोलना, मनमर्जी का आचरण, घटिया सोच, संवेदनशीलता का अभाव, नीचा दिखाने में दिलचस्पी, धन-माया का बढ़ता अंधमोह आदि ऐसे विकार हैं, जो हमें स्वार्थ की चाशनी से बाहर नहीं आने देते। धन, शक्ति, शिक्षा, जाति, संख्याबल आदि से युक्त व्यक्ति अपने को बड़ा और ताकतवर मानने लगता है। ऐसे में सही और गलत के प्रति वह अपनी आंखें चाहे-अनचाहे मूंद लेता है। सूझबूझ वाला व्यक्ति सोचता है कि कोई उसकी सलाह या नसीहत का बुरा न मान ले। ऐसा असमंजस समाज में बहुत कुछ गलत होने से बचा नहीं पाता। अगर किसी ने कुछ दिलेरी दिखाई तो वह भी भयाक्रांत रहता है। कुछ लोग इसी कारण गलत को चाहे-अनचाहे झेलते रहते हैं।

व्यक्ति अपने विकार दूर नहीं करना चाहता है, पर खुश रहने की चाह पाले रहता है। अगर हमारी आदतों में अहंकार, पाखंड, संकीर्णता, विचलन आदि है तो हमें कमजोर करने के लिए किसी दुश्मन की जरूरत नहीं, बल्कि हम खुद जिम्मेदार हैं। जीवन की उठा-पटक सहज बनानी है तो प्रतिदिन अपने विकारों की धार कम करने के लिए सच्चे अर्थों में प्रयत्नशील रहेंगे, तभी जीने का उद्देश्य सफल हो सकता है। यह कोई असंभव नहीं, लेकिन थोड़ा मुश्किल जरूर है। हमें अपनी दुष्प्रवृत्तियों को अभ्यास से निरंतर तलाशना, तराशना और कम करने की गूंज पर काम करना है।

असलियत में जब हम अपनी गलतियां समझना, मानना और उनका निवारण शुरू करते हैं तो यह मार्ग सरल हो जाता है। इस चिंतन-चेतना से कुछ समय बाद हम पाएंगे कि हम खुद के काफी नियंत्रण में हैं। इससे जीवन काफी सहज बनेगा। निस्संदेह कर्म एक ऐसा भोजनालय है, जहां हमें कुछ आदेश देने की जरूरत नहीं। यहां वही मिलता है, जो हमने पकाया है।

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