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दुनिया मेरे आगे: कराहती कुदरत, तेज गति से चल रहे जीवन को ठिठक कर देखने का समय नहीं

वृक्षों को तैयार होने में पच्चीस-तीस वर्ष लगे हों, वे अब विशाल होकर फलदार और छायादार हो चुके हैं, सड़क की शोभा और सुविधा बन गए हैं, उन्हें सिर्फ सुविधाओं के विस्तार के लिए काट दिया जाए तो इसे कैसे देखा जाएगा? आगे वृक्ष फिर नहीं कटेंगे, इसकी क्या गारंटी है? पढ़ें सुरेशचंद्र रोहरा के विचार।
Written by: जनसत्ता
नई दिल्ली | Updated: April 02, 2024 14:16 IST
दुनिया मेरे आगे  कराहती कुदरत  तेज गति से चल रहे जीवन को ठिठक कर देखने का समय नहीं
प्रकृति के हरे-भरे वृक्षों से ही जीवन की सुंदरता है।
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वृक्ष और जंगल कट रहे हैं। यह ग्रामीण जीवन के करीब वक्त गुजार चुके किसी भी व्यक्ति का दुख हो सकता है कि गांव में एक समय में जो दर्जन भर अमराइयां थीं, वे देखते-देखते कट गईं। वहां आज बस्तियां बस गई हैं। यह हमारी आज की आधुनिक जीवन पद्धति का नमूना है। जब हम गांव, कस्बे में रहते थे तो वृक्षों से प्रेम करते थे। उनके महत्त्व को समझते थे, अमरैया सजाते थे। आम, जामुन और अन्य फलदार वृक्ष किसी मायावी चमत्कार से नहीं उगते थे।

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हमारी लालच की, अकर्मण्यता की शायद कोई इंतिहा नहीं

निस्संदेह हमारे पुरखों ने इन्हें बड़े जतन से लगाया होगा। उन्हें मालूम था कि आने वाली पीढ़ी के लिए यह अपरिहार्य है। क्या ऐसा नहीं लगता कि उन्होंने अपनी दृष्टि से आने वाली पीढ़ी को एक ऐसा प्राकृतिक संबल दिया था, विरासत दी थी कि जिसकी छाया में हम सुखी, समृद्ध या खुशहाल जीवन जीएं। मगर हमारी लालच की, अकर्मण्यता की शायद कोई इंतिहा नहीं है। सवाल है कि क्या हमने इस मसले पर कभी सोचा है कि हमारी इस उदासीनता और नींद में खोए रहने का हासिल क्या होने वाला है! हम सब समझते हैं और यह सच है। एक अपढ़ से भी पूछ लिया जाए तो वह संवेदना का भरपूर प्रदर्शन करते हुए कहेगा कि वृक्ष हमारा जीवन है।

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सब कुछ जान कर भी अनजान बनने का नाटक करते हैं हम

आज की स्थिति पर वह दुख भी जाहिर करेगा। जिसके हाथों में दारोमदार है, वह खामोश है। यह सब कुछ जान कर भी अनजान बनने का नाटक क्यों करते हैं हम? इस मसले पर हमारे बीच कोई गंभीर विमर्श और कुछ जमीनी स्तर पर सक्रिय गतिविधियां क्यों नहीं दिखाई देतीं? दरअसल, शहरों को जोड़ने वाले लंबे राजमार्ग बन रहे हैं। सरकारों की ओर आश्वासन दिया जाता है कि जितने वृक्ष कटेंगे, उससे चार गुना ज्यादा पेड़ सरकार और ठेकेदार के कांरिदे लगाएंगे।

सौभाग्य या दुर्भाग्य, हमारे शहर में भी छह या चार लेन की सड़कें बड़ी तेजी से बन रही हैं। यह सड़कें विकराल दिखाई देती हैं, मानो कहां जा रही हों, कुछ पता नहीं। यह भी ध्यान में आता है कि अचानक प्रकट होकर ये कितनी जिंदगियों को लील जाएंगी! जहां राजमार्ग जैसी सड़कें बन रही हैं, वहां प्रतिदिन कितने ही पेड़ कट रहे हैं। सोचने वाली बात है और इसका कारण क्या होगा कि स्थानीय लोग ऐसी जगहों पर काम नहीं कर रहे, बल्कि किसी और शहर से या दूर से आकर लोग वृक्षों को काट रहे हैं। यह समझना मुश्किल है कि यह स्थानीय लोगों की राय भिन्न होने या उनके दुखी होने की वजह से है या फिर यह कोई नीतिगत फैसला होता है।

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जिन वृक्षों को तैयार होने में पच्चीस-तीस वर्ष लगे हों, वे अब विशाल होकर फलदार और छायादार हो चुके हैं, सड़क की शोभा और सुविधा बन गए हैं, उन्हें सिर्फ सुविधाओं के विस्तार के लिए काट दिया जाए तो इसे कैसे देखा जाएगा? आगे वृक्ष फिर नहीं कटेंगे, इसकी क्या गारंटी है? अगर काटना ही था तो लगाया क्यों गया? क्या यह नीतियों की दूरदर्शिता पर प्रश्न-चिह्न नहीं है? शायद ऐसा हर जगह हो रहा है।

कस्बे, गांव का नाम बदल दिया जाए, देश-दुनिया में यही हो रहा है। यह दिखावे की जिंदगी और दुनिया बन चुकी है, जहां संवेदनाएं मर रही हैं। अन्यथा सैकड़ों-हजारों पेड़ काटने पर भी स्थानीय लोगों के सिवा कहीं और से ठोस विरोध नहीं दिखता। कहते हैं, मनुष्य की तरह ज्ञान और संवेदना सृष्टि में किसी अन्य प्राणी में नहीं है। मनुष्य अपनी संवेदनाओं के कारण ही मनुष्य है। वह सृष्टि के कण-कण से प्रेम करता है। उसे यह ज्ञान है कि आज इस सुंदरता के बीच तादात्म्य के साथ जीना है। जीवन में शिवम् का भी स्थान है और सत्यम् तो अंतरस्थ है।

इस सबके बावजूद छोटी-छोटी बातों को नजरअंदाज करता मनुष्य क्या किसी बड़े बदलाव की आहट ले रहा है, जो मौन है। जहां मुखर होना चाहिए वहां खामोश है। यह सच है कि सरकार और सत्ता के सामने लोगों का विरोध तूती की आवाज है। ठीक है कि लोग दैनंदिन के काम में इतना डूब चुके हैं कि उनके पास देखने-सुनने के लिए समय नहीं है। मगर क्या हम सभी ऐसे हो चले हैं? ऐसा संभव है। मगर जंगल और वृक्षों के मामले में संघर्ष की राह पर एक भी चेहरा सामने नहीं है जो प्रेम से या चीख कर प्रतिकार दर्ज कराता दिखता हो। सच तो यह है कि बड़े-छोटे लोक लुभावन नारों और आज के महापुरुषों के भरोसे जंगल नहीं बचा सकते। इसके लिए सामान्य साधारण आदमी को सामने आना होगा।

अगर गांव की बात करें, जंगल के आसपास बसे सामान्य गरीब को भी यह समझ और जुगत लगानी होगी कि वृक्ष की रक्षा कैसे की जाए। जिम्मेदारी जंगल के वन अमले के ऊपर डालना बेकार सिद्ध हो चुका है। जंगल में जमीन पर काबिज होना, फिर कानूनी दांवपेच से पट्टे ले लेना सामान्य बात हो चुकी है। ये हालात बन रहे हैं तो विशाल जंगल जो आज सिमट रहे हैं, सिमटते जा रहे हैं, अपना अस्तित्व खो देंगे। अगर उस दिन हमारी नींद खुलेगी तंद्रा टूटेगी तो फिर यह दुर्भाग्य है और हमारे संवेदनशील होने पर भी प्रश्न चिह्न।

यह कैसा समय है, जब हम तेज गति से चल रहे हैं, दौड़ रहे हैं। ठिठक कर देखने का हमारे पास समय नहीं है। हमारे आसपास प्रकृति के विनष्ट होने कि जो खाई स्वयं हम खोद रहे हैं, वह एक दिन हमारे अस्तित्व को समाप्त कर देगी। इतनी भी समझ हमें नहीं है तो फिर मनुष्य पृथ्वी का सबसे तीव्र बुद्धि वाला प्राणी कैसे है?

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