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दुनिया मेरे आगे: आभासी दुनिया के जाल में फंसने के बाद इससे बाहर निकलना मुश्किल

कोई भी माध्यम उपयोग करने वाले की नीयत और प्रकृति पर निर्भर करता है। परमाणु शक्ति का प्रयोग विध्वंस के लिए भी किया जा सकता है तो ऊर्जा संयंत्र के लिए भी। एक चाकू का प्रयोग किसी की जान लेने के लिए भी हो सकता है तो चिकित्सक इसका प्रयोग किसी की जान बचाने के लिए करता है।
Written by: जनसत्ता | Edited By: Bishwa Nath Jha
नई दिल्ली | Updated: April 19, 2024 04:53 IST
दुनिया मेरे आगे  आभासी दुनिया के जाल में फंसने के बाद इससे बाहर निकलना मुश्किल
प्रतीकात्मक तस्वीर। फोटो -(इंडियन एक्सप्रेस)।
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विनय कुमार पाठक

इसमें कोई दो मत नहीं कि यह सोशल मीडिया का युग है। सोशल मीडिया के अनेक लाभ हैं, इससे भी इनकार नहीं किया जा सकता है। स्मार्टफोन और हर जगह नेटवर्क की उपलब्धता ने सोशल मीडिया से जुड़े रहने को बहुत ही आसान बना दिया है। इसके कारण हम हमेशा अपने मित्रों रिश्तेदारों से आभासी संपर्क में तो रहते ही हैं, अनजान लोगों से भी संपर्क बना लेते हैं।

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विश्व के किसी भी कोने में रहने वाले से आभासी दुनिया में मित्रता की जा सकती है। हमें अपनी प्रतिभा और अपना शौक भी दुनिया के साथ साझा करने का अवसर सोशल मीडिया के कारण उपलब्ध हो पाता है। यह निश्चित रूप से इसके वे फायदे हैं, जो प्रत्यक्ष दिखते हैं और आजकल के दौर में हम सब इसे देख-समझ और महसूस कर सकते हैं। पर जिस प्रकार हर सिक्के के दो पहलू होते हैं, उसी प्रकार सोशल मीडिया के भी दो पहलू हैं। एक ओर इससे कई लाभ हैं और हम सब न सिर्फ अक्सर इसे गिनाते रहते हैं, बल्कि इस दुनिया में इस तरह गुम रहते हैं तो इसके पीछे हमारा तर्क यही होता है कि यह फायदेमंद है। मगर दूसरी ओर इसके नुकसान भी हैं।

हमारे व्यस्त होने में सोशल मीडिया पर मौजूद जिस भी सामग्री की भूमिका हो, हम उसके ऐसे लती हो जाते हैं कि वह एक तरह की जकड़बंदी होती है। मगर इसके समांतर दूसरे स्तर पर देखें तो अश्लील और अर्ध-अश्लील सामग्री से इंटरनेट का संसार अटा पड़ा है। इस जाल में फंसने के बाद इससे निकलना एक बड़ी चुनौती होती है। मगर इससे आगे सामाजिक प्रभाव वाली परिस्थितियां ज्यादा चिंताजनक हैं। कुछ मामलों में भीड़ हिंसा या भीड़ के हाथों हत्या जैसी जघन्य घटना भी सोशल मीडिया पर अफवाह फैलाने के कारण घटी है। इससे हम समझ सकते हैं कि इसके दुष्प्रभावों का स्तर क्या हो सकता है।

कोई भी माध्यम उपयोग करने वाले की नीयत और प्रकृति पर निर्भर करता है। परमाणु शक्ति का प्रयोग विध्वंस के लिए भी किया जा सकता है तो ऊर्जा संयंत्र के लिए भी। एक चाकू का प्रयोग किसी की जान लेने के लिए भी हो सकता है तो चिकित्सक इसका प्रयोग किसी की जान बचाने के लिए करता है। कहा भी गया है कि विष, जो प्राणों के लिए खतरा होता है, उसे भी विष के दुष्प्रभाव को दूर करने के लिए औषधि के रूप में प्रयुक्त किया जा सकता है।

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दरअसल, सदुपयोग करने के बरक्स आज सोशल मीडिया का दुरुपयोग करने वालों की कमी नहीं है। आज फेसबुक और इंस्टाग्राम या यूट्यूब पर बहुत कम अवधि के रील बनाने और उसे सोशल मीडिया के किसी मंच पर जारी करने वालों की संख्या दिनोंदिन बढ़ती जा रही है। कई बार लोग वीडियो बनाने के चक्कर में ऐसे-ऐसे खतरनाक कदम उठाते हैं कि अपनी जान भी गंवा बैठते हैं।

पर खेद की बात यह है कि कई लोग दूसरे लोगों की भावना को ठेस पहुंचाने के लिए ही वीडियो बनाते हैं। जहां बात आस्था की होती है, वहां तर्क का कोई काम नहीं होता। हर धर्म में कई ऐसी बातें हो सकती हैं, जिसे तर्क की कसौटी पर नहीं कसा जा सकता। मगर सोशल मीडिया पर इसे लेकर एक विचित्र नासमझी दिखती है।

सकारात्मक नकारात्मक सोच वाले लोग दूसरे धर्म की कमियों को दिखाने के लिए तरह तरह के वीडियो जारी कर देते हैं। इससे उस संबंधित धर्म के लोगों की धार्मिक भावना को ठेस पहुंचना स्वाभाविक है, जिस धर्म के विरुद्ध कुछ अशोभनीय लिखा या दिखाया गया है। नतीजतन, प्रतिशोध की भावना से दूसरी ओर से भी जवाब में ऐसे वीडियो जारी किए जाते हैं, जो दूसरे धर्म के लोगों की भावना को ठेस पहुंचाते हों।

इस प्रकार एक दुश्चक्र बन जाता है जो एक दूसरे धर्म के लोगों की धार्मिक भावना को आहत कर समाज में असहिष्णुता फैलाता है। इस तरह के कृत्य अविवेकशील लोगों के द्वारा किए जाते हैं। विवेक से लैस लोगों को चाहिए कि इस प्रकार की गतिविधियों पर कोई प्रतिक्रिया न दें, मगर अफसोस कि कई बार सोचने-समझने वाले लोग भी ऐसे विवादों में सक्रियता से हिस्सा लेते हैं।

इससे इस तरह के विवादों का विस्तार ही होता है। कुछ ऐसे लोगों के विरुद्ध टिप्पणियां की जाती हैं, जिनका समाज के एक वर्ग के ऊपर काफी नकारात्मक प्रभाव होता है। इससे सामाजिक सौहार्द भी बिगड़ता है। जरूरी है कि इस तरह के बेकार विवादों से बचकर रहा जाए सोशल मीडिया के समाज विरोधी उपयोग करने वालों से। यों कहने को इसका नामकरण सोशल मीडिया के रूप में किया गया है, जिसका अर्थ यह होना चाहिए कि इन मंचों पर एक नया समाज बने। सवाल है कि समाज का स्वरूप क्या होता है?

सहयोग, सद्भाव और संवेदना जैसे तत्त्वों की जो प्रचुरता जमीनी स्तर पर समाज में पाई जाती है, उसका कितना अंश सोशल मीडिया पर बने कथित समाज में वास्तव में दिखता है। अगर किसी व्यक्ति ने अपने दुख या अपनी खुशी सोशल मीडिया पर साझा की, तो उसके प्रति जरूरी संवेदना जताने के लिए सैकड़ों-हजारों लोगों का संदेश आ जाएगा।

मगर वास्तव में जिस तरह किसी के पास होने और उसकी मदद की दरकार होती है, उससे दुख-सुख साझा करके वास्तविक सहयोग प्राप्त करने की जो उम्मीद होती है, वह सोशल मीडिया पर शायद ही कभी पूरी होती है। जबकि जमीनी स्तर के समाज का यही सब जीवन तत्त्व रहा है। जाहिर है, इंटरनेट के आभासी समाज और वास्तविक समाज में यही फर्क है, जो एक स्तर पर सच और कल्पना की दुनिया से परिचित कराता है।

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