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दुनिया मेरे आगे: अवसाद का दुर्गम दौर, रास्ते सैकड़ों हैं, पर साथ ही अंधेरी तंग गलियों से गुजरना भी मजबूरी

वक्त से उसकी ताकत पूछने की भूल और हिमाकत कभी नहीं करनी चाहिए। वह शुरू से लेकर अब तक हर मौके पर साबित हुआ है कि वक्त क्या है और कितनी ताकत रखता है। सिद्धांतों और आदर्शों की बातें करते हुए अब सांस्कृतिक धरोहर पर इतराना भी छोड़ देना चाहिए। पढ़ें अवनि सोमानी का लेख।
Written by: जनसत्ता
नई दिल्ली | Updated: February 27, 2024 09:21 IST
दुनिया मेरे आगे  अवसाद का दुर्गम दौर  रास्ते सैकड़ों हैं  पर साथ ही अंधेरी तंग गलियों से गुजरना भी मजबूरी
प्रतीकात्‍मक तस्‍वीर। फोटो- (इंडियन एक्‍सप्रेस)।
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वक्त का बीतना नियति है और अपने आरंभ के साथ ही यह बदस्तूर जारी है। समय और हालात ने हमारे दिलो-दिमाग का जायका जरूर बदला है, लेकिन हमारे पारंपरिक दृष्टिकोण में कोई परिवर्तन नहीं आ पाया है। हालांकि वैयक्तिक सोच का अवमूल्यन अवश्य हुआ है, बावजूद इसके हम स्वयं में व्याप्त कमियों, खामियों, विसंगतियों और विकृतियों को स्वीकार करने से साफ-साफ कतराते रहे हैं। अब तो सब तरफ ही एक विचित्र सोच का सिलसिला चल पड़ा है। नैतिक और मानवीय मूल्य के कद्रदान तेजी से घटे हैं और पाशविकता और दैत्य प्रवृत्ति अप्रत्याशित रूप से पनपी है। जिंदगी कितनी जटिल हो गई है। मुकम्मल तौर पर कोई भी खुश और संतुष्ट नहीं। हर जगह बस त्राहि-त्राहि और बिगड़ा हुआ कुछ ठीक हो जाने की आस या फिर कुछ पा लेने की होड़। हालांकि न जिद और जुल्म से किसी का बेड़ा पार हुआ है और न ही स्वार्थ से कोई पनपा है। एक अजीब से इतिहास की संरचना में सभी प्रयासरत हैं।

सवालों का जवाब हमें पता, मगर सच स्वीकार नहीं

कई बार ऐसा लगता है कि भय की भावना से उबर चुका है मानव मन। मगर क्या यह सचमुच भय से उबरना है? विश्वास, पूजा और आस्था अब कितने मूल रूप में कहां बचा है? क्या यह सच नहीं है कि इन मामलों में हम बेहद औपचारिक हो चले हैं। कसूरवार हम नहीं तो फिर और कौन है? अगर हम किसी और की ओर अंगुली उठाते हैं तो क्या वह सचमुच ऐसी हैसियत रखता है कि हम पर खुद को हावी कर ले? हमारे सवालों का जवाब शायद हमें पता होता है। मगर सच कब और किसने स्वीकार किया है? फैसला दर्ज है इधर अपने ही भीतर। यह जानकर भी सब अनजान बने हुए हैं। न उठते बवंडर के रुख का पता होता है और न ही स्पर्श और अहसास के संदर्भ ही ज्ञात हैं, लेकिन रास्ते की खोज और उसके बारे में पूछना जारी रहता है। गौर से देखें तो रास्ते सैकड़ों हैं, पर साथ ही अंधेरी तंग गलियों से गुजरना भी एक मजबूरी है।

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विचित्र है कि भोगवादी संस्कृति, हर जुल्म सहने को तैयार

विचित्र है कि भोगवादी संस्कृति हर जुल्म सहने को तैयार है। अंजाम चाहे जो भी हो, मन को मर्जी से और भावनाओं को यथार्थ तले दबना ही होगा। तैयार होती पृष्ठभूमि में बोध का महत्त्व कुछ ज्यादा ही है। अब परिभाषा में बंधने की कतई जरूरत नहीं। एक खुली किताब हमारे सामने है। इतिहास के पन्नों में सिमटती जिंदगी के हाशिये पर हमारी अच्छी-बुरी हर एक पहचान मौजूद है, जिसे स्वीकारने और नकारने की हिम्मत और क्षमता किसी में भी नहीं।

अब बस समर्पण ही एकमात्र रास्ता लगता है और जो समर्पित होगा, उद्धार भी उसी का होगा। आज खोज उसकी है, जो वेदना में विलीन होती संवेदना की मजबूरी भी समझे। हम क्या चाहते हैं, यह खुद हमें ही ज्ञात नहीं। यह स्थिति कैसे और कहां से आई? इसमें बह जाने में हमारी कितनी भूमिका है? क्या कुछ ऐसा भी है जो सुचिंतित तरीके से हमारे सामने परोसा गया और हम उसके शिकार होते चले गए? मगर तब सवाल उठता है कि हमारी संवेदना के साथ हमारे विवेक का तालमेल कितना रहा!

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दरअसल, स्नेह और सहानुभूति के लिए निरंतर तरसते इंसान के भीतर जिज्ञासाएं भी अनंत हैं। सभी हैरान और हतप्रभ दिखते हैं। पाखंडवाद और परंपरागत रूप से प्रगति पर दिख रहे हैं। मानदंडों की आधारशिला भी रखी जा चुकी लगती है। वक्त से उसकी ताकत पूछने की भूल और हिमाकत कभी नहीं करनी चाहिए। वह शुरू से लेकर अब तक हर मौके पर साबित हुआ है कि वक्त क्या है और कितनी ताकत रखता है। सिद्धांतों और आदर्शों की बातें करते हुए अब सांस्कृतिक धरोहर पर इतराना भी छोड़ देना चाहिए। मगर अपने आप से मुंह नहीं मोड़ना चाहिए। खुद को ठीक रखा जा सका तब अगर बहुतों को नहीं तो कुछ को जरूर संभाला जा सकेगा।

युग बदलने के साथ इतिहास भी बदला है। जमीन के यथार्थ को मीनार की ऊंचाइयों से मापने की आदत से हम बाज आ जाएं तभी अच्छा है। अक्षम्य कारस्तानियों के नीचे इंसानियत और मानवता का हर सुखद लम्हा दफन है। जिंदगी की उस रेखांकित इबारत पर नजर डाली जा सकती है, जो मुकम्मल मंजिल तलाशने के प्राथमिक प्रयास करती है। मगर यह असंभव है, क्योंकि आज हम अवसाद के दुर्गम दौर से गुजर रहे हैं और यह एक चुनौती भरी जटिल प्रक्रिया है। इंसान को इंसान से जोड़ने की बात पर जाने की जरूरत शायद बाद में पड़े, पहले अपने ही भीतर तहकीकात कर एक लंबा सफर तय करने की जरूरत है। सात्विकता की खोज में निरंतर भटक रहा हमारा थका-हारा और टूटा मन अब ठहराव चाहता है।

अगर अपनी ताकत और सीमा, दोनों की ईमानदार पहचान कर ली जाए तो चुनौतियों के सैलाब को पार करना कतई मुश्किल नहीं, पर संघर्षों का बीड़ा उठाने का कोई साहस भी तो करे! जिंदगी का अर्थ जानने का उत्साह किसी के भीतर देखने को नहीं मिलता, जबकि जिंदगी के अर्क में ही सारी सुखद और खुशनुमा अनुभूतियां छिपी हुई हैं। दरअसल, आज जरूरत यह जानने की नहीं कि जिंदगी ने हमें क्या दिया, बल्कि यह सोचने और समझने की है कि हमने जिंदगी को वास्तव में कैसे सजाया और संवारा है। ऐसे हर एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न पर आज हर आम इंसान लाचार और निरुत्तर-सा हो जाता है।

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