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दुनिया मेरे आगे: बदलते जमाने के खेल-खिलौनों से घट रही बच्चों की कल्पना करने की क्षमता, नहीं दिखते खेलने के पारंपरिक उपकरण

बदलते खिलौनों के साथ सुरक्षा और स्वास्थ्य से जुड़ी चिंताएं भी बढ़ी हैं। पारंपरिक खिलौने अक्सर प्राकृतिक और सुरक्षित सामग्री से बने होते थे। आधुनिक खिलौने प्लास्टिक और अन्य सिंथेटिक सामग्री से बने होते हैं, जो बच्चों के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकते हैं। पढ़ें सुरेश कुमार मिश्रा‘ उरतृप्त’ के विचार।
Written by: जनसत्ता
नई दिल्ली | Updated: May 28, 2024 14:30 IST
दुनिया मेरे आगे  बदलते जमाने के खेल खिलौनों से घट रही बच्चों की कल्पना करने की क्षमता  नहीं दिखते खेलने के पारंपरिक उपकरण
चीन में बढ़ती लागत से खिलौना व्यापारी जूझ रहे हैं।
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समय के साथ बच्चों के खिलौने भी बदलते रहे हैं। यह परिवर्तन सिर्फ खिलौनों के आकार-प्रकार में नहीं, उनके निर्माण सामग्री, तकनीक और बच्चों के जीवन पर उनके प्रभाव में भी देखा जा सकता है। आज के खिलौने एक ओर बच्चों की कल्पनाशक्ति और मानसिक विकास को बढ़ावा देने वाले होते हैं, दूसरी ओर वे पारंपरिक खिलौनों से अलग भी हैं। पारंपरिक खिलौनों में गुड़िया, गेंद, लकड़ी और मिट्टी के खिलौने, पतंगें आदि शामिल थे। ये खिलौने बच्चों के शारीरिक और मानसिक विकास में अहम भूमिका निभाते थे। गुड़िया पात्र के अभिनय में मदद करती, जिससे बच्चों के भीतर कल्पनाशक्ति का विकास होता। पतंग उड़ाने से ध्यान केंद्रित करने की क्षमता बढ़ती और कौशल में सुधार होता। ये खिलौने स्थानीय कारीगरों द्वारा बनाए जाते, जो बच्चों को स्वदेशी कारीगरी और सांस्कृतिक धरोहर से जोड़ते थे। कुल मिलाकर, पारंपरिक खिलौने बच्चों के समग्र विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान देते थे।

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आधुनिक खिलौनों में तकनीक का उपयोग बढ़ गया है

आधुनिक खिलौनों में तकनीक का उपयोग बढ़ गया है। इनमें वीडियो गेम, रोबोट खिलौने, ‘वर्चुअल रियलिटी’ सेट और ‘इंटरैक्टिव’ यानी बातचीत करने वाले खिलौने शामिल हैं। ये खिलौने बच्चों को नई तकनीकों से परिचित कराते हैं और उनके तकनीकी कौशल को विकसित करने में मदद करते हैं। हालांकि इन खिलौनों के अत्यधिक उपयोग से बच्चों के शारीरिक खेल की गतिविधियां कम हो सकती हैं, जिससे उनकी सेहत पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। तकनीकी खिलौनों की बात करें तो वीडियो गेम सबसे प्रमुख हैं, जिसने बच्चों के खेल का तरीका पूरी तरह बदल दिया है। आज के बच्चे न सिर्फ खेलते, बल्कि वे खेलों में एक अलग दुनिया में खो जाते हैं। वीडियो गेम के अलावा रोबोट खिलौने बच्चों को ‘प्रोग्रामिंग’ और ‘रोबोटिक्स’ की मूल बातें सिखाने में मदद करते हैं। ये खिलौने बच्चों की तार्किक और समस्या सुलझाने की क्षमता को बढ़ाते हैं।

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खिलौनों का बच्चों के सामाजिक विकास पर भी गहरा प्रभाव पड़ता है। पारंपरिक खिलौने जैसे गुड़िया, रसोईघर सेट और ‘रोल-प्ले’ खिलौने बच्चों को सामाजिक भूमिकाओं और जिम्मेदारियों को समझने में मदद करते हैं। इसके विपरीत, आजकल के व्यक्तिगत वीडियो गेम और डिजिटल खिलौने बच्चों को अकेला खेलना सिखाते हैं, जिससे उनके सामाजिक कौशल में कमी आ सकती है। हालांकि बहुआयामी और आनलाइन खेलों ने इस कमी को कुछ हद तक पूरा किया है, जहां बच्चे आनलाइन अपने दोस्तों के साथ खेल सकते हैं और सामाजिक बातचीत कर सकते हैं।

शैक्षिक खिलौने भी आजकल काफी लोकप्रिय हो गए हैं। इनका उद्देश्य बच्चों को खेल-खेल में सिखाना होता है। ‘पजल्स’ और ‘मेमोरी गेम’ बच्चों की सोचने की क्षमता और याददाश्त को सुधारते हैं। शैक्षिक खिलौने बच्चों की विभिन्न शैक्षिक अवधारणाओं को समझने में मदद करते हैं, जिससे उनका बौद्धिक विकास होता है। डिजिटल और संवाद वाले खिलौनों ने बच्चों के खेल का परिदृश्य पूरी तरह बदल दिया है। ये खिलौने बच्चों को एक अलग अनुभव प्रदान करते हैं, जहां वे खिलौनों के साथ संवाद कर सकते हैं। ये खिलौने बच्चों की सीखने की प्रक्रिया को मजेदार और प्रभावी बनाते हैं।

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खिलौनों का चयन अक्सर परिवार और संस्कृति पर निर्भर करता है। पारंपरिक खिलौने, जो स्थानीय कारीगरों द्वारा बनाए जाते थे, बच्चों को उनकी सांस्कृतिक धरोहर से जोड़ते थे। वे स्थानीय परंपराओं और कहानियों को जीवंत रखते थे। आधुनिक खिलौने, जो अक्सर बड़े पैमाने पर निर्मित होते हैं, बच्चों को वैश्विक सांस्कृतिक संदर्भों से जोड़ते हैं। मगर इन खिलौनों ने बच्चों के सांस्कृतिक जुड़ाव को कुछ हद तक कमजोर कर दिया है, क्योंकि वे स्थानीय परंपराओं और कारीगरी से दूर होते जा रहे हैं।

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बदलते खिलौनों के साथ सुरक्षा और स्वास्थ्य से जुड़ी चिंताएं भी बढ़ी हैं। पारंपरिक खिलौने अक्सर प्राकृतिक और सुरक्षित सामग्री से बने होते थे। आधुनिक खिलौने प्लास्टिक और अन्य सिंथेटिक सामग्री से बने होते हैं, जो बच्चों के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकते हैं। इसके अलावा, तकनीकी खिलौने बच्चों की आंखों और मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकते हैं। इसलिए, खिलौनों की सुरक्षा मानकों का पालन और उनके उपयोग की निगरानी आवश्यक है।

बच्चों के खिलौनों के उद्योग में भी महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुए हैं। आज का खिलौना बाजार पहले से कहीं अधिक प्रतिस्पर्धी और विविध हो गया है। कंपनियां बच्चों के आकर्षण के लिए नए-नए तरीके ढूंढ़ रही हैं। इसके परिणामस्वरूप, खिलौनों में नवाचार और तकनीकी उन्नति की दर बढ़ गई है। खिलौनों के बाजार में ई-कामर्स मंचों की वृद्धि ने भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है, जिससे बच्चों और माता-पिता के लिए खिलौनों की खरीदारी आसान हो गई है। आधुनिक खिलौनों के बढ़ते उपयोग के साथ ही उनके पर्यावरणीय प्रभाव भी बढ़ गए हैं। प्लास्टिक और अन्य गैर-बायोडिग्रेडेबल सामग्रियों का उपयोग पर्यावरण के लिए हानिकारक हो सकता है। इसलिए खिलौना निर्माताओं को टिकाऊ और पर्यावरण के अनुकूल सामग्री का उपयोग करने पर विचार करना चाहिए।

बच्चों के खिलौनों में बदलाव समाज और संस्कृति के विकास को दर्शाते हैं। पारंपरिक खिलौने स्थानीय परंपराओं से जोड़ते थे, जबकि आधुनिक खिलौने नई तकनीकों से परिचित कराते हैं। हालांकि, आधुनिक खिलौनों के साथ सुरक्षा, स्वास्थ्य और पर्यावरणीय चिंताएं भी जुड़ी हैं। इसलिए, खिलौनों का चयन बच्चों के समग्र विकास को ध्यान में रखते हुए सोच-समझकर करना चाहिए।

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